1026 से 2026 तक: सोमनाथ मंदिर के 1,000 वर्ष पूरे, आस्था का प्रतीक

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (06/01/2026): गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लिए साल 2026 बहुत खास होने वाला है। आज से ठीक 1,000 साल पहले यानी 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर हमला कर इसे भारी नुकसान पहुँचाया था, जिसके बाद इसे फिर से बनाया गया था। यह मंदिर गुजरात के समुद्र किनारे बसा है और इसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इस मंदिर को “अमर मंदिर” भी कहा जाता है क्योंकि इतिहास में इसे कई बार तोड़ा गया, लेकिन हर बार यह अपनी पुरानी शान के साथ फिर से खड़ा हो गया। यह मंदिर हमारी कभी न हार मानने वाली आस्था का प्रतीक है।

सोमनाथ मंदिर को “अमर मंदिर” कहा जाता है क्योंकि इसकी कहानी बहुत ही अद्भुत है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर को सबसे पहले चंद्रदेव ने सोने से बनवाया था, फिर रावण ने इसे चांदी से बनवाया और भगवान श्रीकृष्ण ने इसे चंदन की लकड़ी से तैयार करवाया था। इतिहास की बात करें तो, अपनी बेहिसाब दौलत और प्रसिद्धि की वजह से यह मंदिर कई बार हमलावरों के निशाने पर रहा। सबसे बड़ा हमला महमूद गजनवी ने 1025 -1026 ईस्वी में किया था, जिसने मंदिर को लूटा और काफी नुकसान पहुँचाया। इसके बाद भी, औरंगजेब जैसे कई शासकों ने इसे तोड़ने की कोशिश की, लेकिन लोगों की आस्था ने इसे हर बार दोबारा खड़ा कर दिया।

आज हम सोमनाथ मंदिर का जो भव्य रूप देखते हैं, उसे बनाने का सपना सरदार वल्लभभाई पटेल ने देखा था। 1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब उन्होंने इस मंदिर को फिर से बनवाने का फैसला किया। मंदिर को दोबारा बनाने की शुरुआत नवंबर 1947 में हुई और जब यह बनकर तैयार हुआ, तो 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया।

यह मंदिर वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है जिसे ‘मारू-गुर्जर’ शैली में बनाया गया है। यह राजस्थान और गुजरात की मिली-जुली कला है। मंदिर को शहद जैसे हल्के पीले या क्रीम रंग के पत्थरों से बनाया गया है, जिन पर बहुत ही बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है। इसके मुख्य हिस्सों में एक भव्य प्रवेश द्वार, कई परतों वाला घुमावदार ऊंचा शिखर और एक गर्भगृह है, जिसके अंदर भगवान शिव का एक विशाल काला शिवलिंग स्थापित है।

भौगोलिक दृष्टि से भी यह जगह बहुत खास है। यह मंदिर ‘त्रिवेणी संगम’ पर स्थित है, जहाँ कपिला, हिरण और सरस्वती नाम की तीन नदियों का मिलन होता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह मंदिर एक ऐसी सीधी रेखा पर स्थित है कि अगर आप यहाँ से दक्षिण की तरफ एक सीधी लकीर खींचें, तो वह बिना किसी ज़मीन या पहाड़ से टकराए सीधे अंटार्कटिका तक पहुँच जाएगी। यानी इसके और दक्षिण ध्रुव के बीच में कोई भी भूभाग नहीं है।

सोमनाथ मंदिर का यह 1,000 साल का उत्सव सिर्फ एक पूजा-पाठ का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की शानदार कला और कभी न हार मानने वाली हिम्मत का जश्न है। प्राचीन काल से लेकर आजादी के बाद इसके दोबारा बनने तक, सोमनाथ मंदिर हमारे गौरव का प्रतीक रहा है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि भले ही कोई इमारतों को तोड़ दे, लेकिन लोगों के मन में बसी आस्था को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। यह मंदिर कल भी अडिग था और आज भी शान से खड़ा है।

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