अरावली रिज में सड़क निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा DDA, 473 पेड़ों पर संकट
टेन न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi News (03 January 2026): दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अरावली रिज क्षेत्र में सड़क निर्माण की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। डीडीए ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर 473 पेड़ों को काटने या स्थानांतरित करने और 2,519 छोटे पौधों को हटाकर दूसरी जगह लगाने की मंजूरी मांगी है। प्रस्तावित सड़क का उद्देश्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए बनाए जा रहे अस्पताल, सीएपीएफआईएमएस (CAPFIMS) तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करना बताया गया है।
डीडीए के अनुसार, यह सड़क मॉर्फोलॉजिकल रिज के लगभग 0.79 हेक्टेयर क्षेत्र में बनाई जानी है, जबकि कुल 2.97 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की अनुमति मांगी गई है। प्राधिकरण का कहना है कि पहले इस परियोजना के लिए 3.6 हेक्टेयर वन भूमि की आवश्यकता बताई गई थी, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से अब इसके दायरे को घटा दिया गया है।
याचिका में डीडीए ने यह भी स्पष्ट किया है कि पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के तौर पर द्वारका के धूलसिरास क्षेत्र में 3.68 हेक्टेयर भूमि पर नए पेड़ लगाए जाएंगे। प्राधिकरण का दावा है कि सड़क परियोजना को इस तरह डिजाइन किया गया है, जिससे न्यूनतम वन क्षेत्र प्रभावित हो और हरित आवरण का संतुलन बना रहे।
गौरतलब है कि अरावली क्षेत्र को लेकर पहले से ही कानूनी और पर्यावरणीय विवाद चल रहा है। 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से जुड़े अपने पुराने निर्देशों पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि यह विषय अत्यंत संवेदनशील है और विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्टों व अदालती टिप्पणियों की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण स्थिति और स्पष्ट किए जाने की जरूरत है।
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह भी शामिल हैं। अदालत ने ‘अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा एवं संबद्ध मुद्दे’ से जुड़ी स्वप्रेरित याचिका में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 21 जनवरी तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि जब तक एक नई उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन नहीं हो जाता, तब तक पुरानी समिति की सिफारिशें और कोर्ट के पहले के निर्देश लागू नहीं होंगे। अदालत का मानना है कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक पहलुओं की समग्र और गहन समीक्षा बेहद जरूरी है।
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