“जिन मूर्तियों के सामने सत्ता झुकती रही, उनके शिल्पकार के लिए सत्ता के पास वक्त नहीं”

टेन न्यूज नेटवर्क

NOIDA/New Delhi News (28 दिसंबर 2025): दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को आकार देने वाले, पद्म भूषण से सम्मानित महान मूर्तिकार राम सुतार का 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म भूषण (Padma Bhushan) प्रदान किया गया था। उनका जाना भारतीय कला (Indian Art), संस्कृति और इतिहास के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। राम सुतार ने न केवल पत्थरों को रूप दिया, बल्कि भारत की सामाजिक चेतना और विचारधारा को स्थायित्व प्रदान किया।

संसद भवन परिसर में स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज, भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और वारकरी संतों की मूर्तियाँ उसी कलाकार की रचनाएँ हैं, जिनके सामने देश का राजनीतिक नेतृत्व वर्षों से नमन करता आया है। लेकिन विडंबना यह रही कि उसी कलाकार को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए राजधानी दिल्ली में रहते हुए भी अधिकांश नेताओं के पास समय नहीं था।

दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा (Tribute Meeting) में राजनीतिक नेतृत्व की लगभग अनुपस्थिति ने सत्ता की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। राम सुतार के बेटे अनिल राम सुतार ने बताया कि कई वरिष्ठ नेताओं के आने की जानकारी दी गई थी, लेकिन क्रिसमस और नववर्ष (Christmas–New Year Programs) के बीच लगातार कार्यक्रमों और व्यस्तताओं के चलते वे कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके।

हालांकि भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से भेजे गए श्रद्धांजलि संदेश सभा में पढ़े गए, लेकिन शारीरिक रूप से उपस्थित होकर अंतिम नमन करने का समय किसी के पास नहीं था। यह स्थिति उस प्रतीकात्मक सम्मान (Symbolic Respect) को उजागर करती है, जो अक्सर कलाकारों को उनके जीवन और निधन के बाद मिलता है—सम्मान शब्दों में, पर संवेदना व्यवहार में अनुपस्थित।

सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह रहा कि राम सुतार का निवास स्थान नोएडा में था, इसके बावजूद नोएडा और गौतम बुद्ध नगर के जनप्रतिनिधि भी इस श्रद्धांजलि सभा में नहीं पहुंचे। राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में रहते हुए भी इस तरह की अनुपस्थिति ने सार्वजनिक जिम्मेदारी (Public Responsibility) और सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

कार्यक्रम में केवल कुछ गिने-चुने लोग ही मौजूद रहे। इनमें केंद्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद रामदास आठवले, समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद रामआश्रय, राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा, महाराष्ट्र सरकार के P&I निदेशक हेमराज बागुल और महाराष्ट्र की रेजिडेंट कमिश्नर (Resident Commissioner) IAS आर. विमला शामिल रहीं। सीमित उपस्थिति के बीच पूरा माहौल यह संदेश दे रहा था कि देश ने अपने एक सांस्कृतिक कोहिनूर (Cultural Kohinoor) को खो दिया है।

राम सुतार भले ही पद्म भूषण जैसे बड़े सम्मान से सम्मानित रहे हों, लेकिन उनके निधन के बाद जिस तरह की उदासीनता देखने को मिली, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारे समाज में कला और कलाकार के प्रति सम्मान अक्सर मंचों और मूर्तियों तक सीमित रह जाता है। जिन मूर्तियों के सामने सत्ता रोज़ झुकती है, उनके शिल्पकार को अंतिम विदाई देने के लिए समय न निकाल पाना, एक कड़वा सच और आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संदेश छोड़ गया है।।


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