DU में ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ का आगाज: विधानसभा स्पीकर विजेंद्र गुप्ता बोले- भाषा और साहित्य से बनती है देश की पहचान
टेन न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi News (29 October 2026): दिल्ली विश्वविद्यालय में 29 और 30 अक्टूबर को दो दिवसीय ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। 29 अक्टूबर को आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में हंसराज कॉलेज की प्राचार्य प्रोफेसर रमा देवी, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोफेसर रंजन कुमार त्रिपाठी, दिल्ली विश्वविद्यालय की कल्चरल काउंसिल के अध्यक्ष अनूप लाठर और ‘रोजगार विद अंकित’ के प्रतिनिधि एवं मोटिवेटर अमर चौधरी सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। रचयिता फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस साहित्य उत्सव के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ. पीयूष पुष्पम हैं। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के प्रोफेसरों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान वक्ताओं ने साहित्य के महत्व, भारतीय संस्कृति के संरक्षण और नई पीढ़ी तक साहित्यिक विरासत पहुंचाने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रोफेसर रमा देवी ने युवाओं के जीवन में साहित्य की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी वास्तविक दुनिया से रील की दुनिया की ओर बढ़ रही है, जहां लोग सुनने के बजाय केवल कुछ क्षणों में मनोरंजन प्राप्त करना पसंद करते हैं। ऐसे समय में साहित्य युवाओं को पढ़ने, ठहरकर सोचने, विचार करने और किसी विषय को गहराई से समझने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को साहित्य पढ़ने के साथ उसमें व्यक्त विचारों पर मंथन करना चाहिए और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए। साहित्य केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज तक सकारात्मक संदेश पहुंचाने और लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम भी करता है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और भारतीय परंपराओं को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोफेसर रंजन कुमार त्रिपाठी और विश्वविद्यालय की कल्चरल काउंसिल के अध्यक्ष अनूप लाठर ने भी साहित्य के महत्व को रेखांकित किया। दोनों वक्ताओं ने साहित्य को शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य के जरिए विचारों, अनुभवों और सांस्कृतिक मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। आज के दौर में जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, परंपराओं और सामाजिक जिम्मेदारियों से परिचित कराता है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विकसित भारत के निर्माण के लिए केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और साहित्यिक परंपराओं का संरक्षण भी जरूरी है। इसके लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों को मिलकर प्रयास करने होंगे, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारतीय साहित्य और संस्कृति से जुड़ी रहें।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने अपने संबोधन में दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े अपने छात्र जीवन की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय और विवेकानंद चौक से उनका पुराना जुड़ाव रहा है और उन्होंने अपने जीवन के छह से सात वर्ष वहां बिताए हैं। इस दौरान वे छात्र राजनीति और छात्र संघ की गतिविधियों से भी जुड़े रहे। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और दिल्ली विधानसभा के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान दिल्ली विधानसभा की इमारत, जो कभी पुरानी संसद के रूप में जानी जाती थी, भारत के इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की साक्षी रही है। उन्होंने बताया कि इसी इमारत में वर्ष 1923 में दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ था और वर्ष 1926 में विश्वविद्यालय का पहला दीक्षांत समारोह भी यहीं आयोजित किया गया था। विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि किसी भी देश की वास्तविक पहचान उसकी भाषा, साहित्य और संस्कृति से होती है। भाषा विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है, जबकि साहित्य उन विचारों को स्थायी रूप प्रदान करता है।
विजेंद्र गुप्ता ने अपने संबोधन में भाषा और संस्कृति के ऐतिहासिक महत्व को समझाते हुए औपनिवेशिक शासन के प्रभावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने लैटिन अमेरिका के देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि औपनिवेशिक शक्तियों ने केवल राजनीतिक शासन ही नहीं किया, बल्कि कई क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रभावित किया। भारतीय सभ्यता की चर्चा करते हुए उन्होंने वेदों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को देश की सांस्कृतिक नींव बताया। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को आक्रांताओं द्वारा जलाए जाने की ऐतिहासिक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि ज्ञान और साहित्य को नष्ट करने का प्रयास किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास होता है। उन्होंने महात्मा गांधी के 1942 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह में दिए गए भाषण का भी उल्लेख किया, जिसमें गांधीजी ने भारतीय भाषाओं और मातृभाषाओं के महत्व पर जोर दिया था। विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी अंग्रेजी मानसिकता का प्रभाव समाज में बना हुआ है। ऐसे में भारतीय भाषाओं और साहित्य को उचित सम्मान देना आवश्यक है।
अपने संबोधन के समापन में विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक शक्ति को मजबूत करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि भाषा विचारों की संवाहक है और साहित्य विचारों को अमर बनाता है। किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी आर्थिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा से भी होती है। ‘रचयिता साहित्य उत्सव’ जैसे आयोजन युवाओं को साहित्य से जोड़ने, भारतीय भाषाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दो दिवसीय इस उत्सव के माध्यम से साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के बीच संवाद को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि विद्यार्थी साहित्य को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा न मानें, बल्कि उसे जीवन, समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़कर देखें।
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