विजयदशमी: राष्ट्र के जागरण, शक्ति की उपासना और समाज के पुनर्निर्माण का संकल्प

लेखक: विनोद बंसल
राष्ट्रीय प्रवक्ता, विश्व हिंदू परिषद

Delhi News (20 अक्टूबर 2026): भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व ऐसे हैं, जिनका महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राष्ट्र के जीवन-दर्शन, सामाजिक चेतना और सामूहिक संकल्प के भी प्रतीक हैं। विजयदशमी ऐसा ही एक महापर्व है। यह अधर्म पर धर्म की, अन्याय पर न्याय की, अहंकार पर विनम्रता की और अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है। यह पर्व हमें केवल अतीत की गौरवगाथाएँ सुनने के लिए प्रेरित नहीं करता, बल्कि वर्तमान की चुनौतियों से जूझने और भविष्य के भारत के निर्माण का संकल्प लेने का अवसर भी प्रदान करता है।

विजयदशमी का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

विजयदशमी को दशहरा और विजया दशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। भारतीय जनमानस में इस पर्व की अनेक धार्मिक, पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ प्रचलित हैं।

उत्तर भारत सहित देश के अनेक भागों में विजयदशमी भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के रूप में मनाई जाती है। रामायण की कथा हमें बताती है कि जब अहंकार, अन्याय और अधर्म अपनी सीमाएँ लाँघने लगते हैं, तब धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष आवश्यक हो जाता है। भगवान श्रीराम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और लोककल्याण के लिए होना चाहिए।

रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और अनेक गुणों से संपन्न था, किंतु उसका अहंकार, अनैतिक आचरण और पराई स्त्री का अपहरण अंततः उसके विनाश का कारण बना। रावण दहन के माध्यम से भारतीय समाज सदियों से यह संदेश देता आ रहा है कि ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव भी व्यक्ति को पतन से नहीं बचा सकते, यदि उसके जीवन से नैतिकता और धर्म का लोप हो जाए।

दूसरी ओर, पूर्वी भारत, विशेषकर बंगाल, असम और ओडिशा के अनेक क्षेत्रों में यह पर्व माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ा है। माँ दुर्गा शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष की प्रतीक हैं। देवताओं की सामूहिक शक्ति से प्रकट हुई देवी दुर्गा की कथा यह संदेश देती है कि जब समाज की विविध शक्तियाँ एक श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए संगठित होती हैं, तब बड़ी से बड़ी आसुरी प्रवृत्ति को भी पराजित किया जा सकता है।

इन दोनों प्रमुख परंपराओं का केंद्रीय संदेश एक ही है—शक्ति और धर्म का संबंध अविभाज्य है। शक्ति का उद्देश्य अन्याय करना नहीं, अन्याय का प्रतिकार करना है; दुर्बल को दबाना नहीं, उसकी रक्षा करना है; और समाज को बाँटना नहीं, उसे संगठित करना है।

एक पर्व, अनेक परंपराएँ और एक सांस्कृतिक राष्ट्र

भारत की विशेषता है कि यहाँ सांस्कृतिक एकता का अर्थ परंपराओं की एकरूपता नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच साझा मूल्यों का संरक्षण है। विजयदशमी इसका सुंदर उदाहरण है।

दिल्ली और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में रामलीलाओं का आयोजन होता है। भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित इन नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, पारिवारिक संबंधों और आदर्श शासन की शिक्षा मिलती है। दशहरे के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन इस बात का प्रतीक बनता है कि समाज को बुराइयों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करना चाहिए।

महाराष्ट्र में विजयदशमी के अवसर पर शमी वृक्ष के पत्तों का आदान-प्रदान करने, शस्त्र-पूजन करने और नए कार्यों का शुभारंभ करने की परंपराएँ प्रचलित हैं। शमी वृक्ष से जुड़ी मान्यताओं में महाभारत के अज्ञातवास की कथा विशेष रूप से स्मरण की जाती है। लोकपरंपरा के अनुसार, पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में सुरक्षित रखे थे और समय आने पर उन्हें पुनः प्राप्त किया था। यह प्रसंग धैर्य, तैयारी और उचित समय पर कर्तव्यपालन का संदेश देता है।

गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया के माध्यम से माँ शक्ति की आराधना होती है। नौ रातों तक चलने वाले ये आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामूहिक सहभागिता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सामाजिक मेलजोल का भी अवसर बनते हैं।

कर्नाटक के मैसूर में दशहरा राजपरंपरा, भव्य शोभायात्राओं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और माँ चामुंडेश्वरी की आराधना के लिए प्रसिद्ध है। यह उत्सव क्षेत्र के ऐतिहासिक गौरव और धार्मिक आस्था का संगम है।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा की अपनी विशिष्ट परंपरा है। यहाँ अनेक देवी-देवताओं की शोभायात्राओं और सामूहिक धार्मिक आयोजनों के माध्यम से स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन होता है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा भी अपनी विशिष्ट जनजातीय और स्थानीय परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है। वहीं, पश्चिम बंगाल में विजया दशमी दुर्गा पूजा के समापन, देवी की विदाई और सामाजिक मिलन का अवसर है।

दक्षिण भारत के अनेक भागों में इस अवसर पर आयुध पूजा की जाती है। औजारों, पुस्तकों, उपकरणों, वाहनों और कार्य में उपयोग होने वाली वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह परंपरा श्रम, कौशल, ज्ञान और आजीविका के साधनों के सम्मान का संदेश देती है।

इन सभी परंपराओं में बाहरी स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किंतु उनका अंतर्निहित भाव समान है—धर्म की प्रतिष्ठा, शक्ति का सम्मान, कर्तव्य का निर्वहन, सामूहिकता और जीवन में शुभ कार्यों का संकल्प। यही भारत की सांस्कृतिक एकात्मता है। असेतु हिमाचलम् यानि हिमालय से समुद्र तक, पूर्व से पश्चिम तक, पूजा-पद्धतियों और उत्सवों की विविधता के बावजूद भारतीय समाज के सांस्कृतिक सूत्र हमें एक व्यापक सभ्यतागत परिवार से जोड़ते हैं।

शस्त्र-पूजन: शक्ति का सम्मान और उसकी मर्यादा का संकल्प

विजयदशमी पर शस्त्र-पूजन की परंपरा का विशेष महत्व है। प्रश्न उठता है कि धर्म और अहिंसा की बात करने वाला समाज शस्त्रों की पूजा क्यों करता है? इस प्रश्न का उत्तर भारतीय जीवन-दर्शन में निहित है। भारतीय परंपरा में शस्त्र को अपने आप में हिंसा का प्रतीक नहीं माना गया, बल्कि उसका महत्व उसके उद्देश्य, उपयोग और मर्यादा से निर्धारित होता है। शस्त्र का आदर्श उपयोग निर्दोषों की रक्षा, अन्याय का प्रतिकार और धर्म की स्थापना है।

भगवान श्रीराम का जीवन धर्म की रक्षा के लिए सामर्थ्य और मर्यादा के समन्वय का उदाहरण है। माँ दुर्गा के हाथों में धारण किए गए विभिन्न आयुध बुराइयों से संघर्ष करने की शक्ति का प्रतीक हैं। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश भी कर्तव्य, विवेक और धर्मसम्मत कर्म की प्रेरणा देता है। शस्त्र-पूजन की परंपरा को इसी व्यापक दृष्टि से समझना चाहिए। इसका आशय केवल हथियारों की पूजा करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि समाज को अपनी रक्षा करने, संकट का सामना करने और दुर्बलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए।

महाभारत में अर्जुन के शमी वृक्ष से अपने अस्त्र-शस्त्र पुनः प्राप्त करने की कथा इस परंपरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता है। ऐतिहासिक रूप से अनेक राजवंशों और योद्धा परंपराओं में विजयदशमी को युद्धाभ्यास, शस्त्र-पूजन और विजय के संकल्प से जोड़कर देखा गया। मराठा परंपरा सहित विभिन्न क्षेत्रों में भी इस दिन शक्ति और सामर्थ्य के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता रहा है।

समय के साथ शस्त्र-पूजन का भाव व्यापक हुआ है। किसान अपने कृषि उपकरणों, कारीगर अपने औजारों, विद्यार्थी अपनी पुस्तकों, कलाकार अपने वाद्ययंत्रों और आधुनिक समाज के लोग अपने कार्योपयोगी उपकरणों का पूजन करते हैं। इसका सार यह है कि जीवन में सफलता और समाज की उन्नति में योगदान देने वाले साधनों के प्रति सम्मान होना चाहिए।

शस्त्र-पूजन का वास्तविक संदेश है—शक्ति प्राप्त करो, किंतु उसका उपयोग धर्म के लिए करो; सामर्थ्यवान बनो, किंतु अहंकारी मत बनो; अपनी रक्षा करो, किंतु निर्दोषों को कभी कष्ट मत पहुँचाओ।

आज जब राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा, आतंकवाद, संगठित हिंसा और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्न हमारे सामने हैं, तब शस्त्र-पूजन की यह भावना और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रशिक्षित और अनुशासित सुरक्षा बल, सक्षम रक्षा व्यवस्था तथा सजग नागरिक आवश्यक हैं। इसके साथ ही, हर नागरिक में कानून के प्रति सम्मान, सामाजिक उत्तरदायित्व और संकट के समय सहायता करने का संस्कार भी विकसित होना चाहिए। शक्ति का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसके साथ संयम, विवेक और उत्तरदायित्व भी जुड़े हों। विजयदशमी का वास्तविक उत्सव तभी सार्थक होगा, जब हम अपने भीतर के दोषों पर विजय प्राप्त करें, समाज की दूरियों को कम करें, निर्बलों की रक्षा करें और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें।

आइए, इस विजयदशमी पर हम संकल्प लें कि भारत को केवल आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नैतिकता, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, नागरिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना के क्षेत्र में भी सशक्त बनाएँगे। हम ऐसा समाज निर्मित करेंगे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान मिले, प्रत्येक परिवार संस्कारों का केंद्र बने, प्रत्येक युवा राष्ट्र की शक्ति बने और प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने के लिए तत्पर रहे।

विजयदशमी हमें यही संदेश देती है कि विजय केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि निरंतर साधना है। जब समाज संगठित हो, व्यक्ति चरित्रवान हो, शक्ति मर्यादित हो और सेवा जीवन का ध्येय बने, तभी राष्ट्र की विजय स्थायी होती है। विजयदशमी का पर्व हम सबको धर्म, संस्कृति, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराए तथा एक समर्थ, समरस, सुरक्षित और आत्मविश्वासी भारत के निर्माण की प्रेरणा दे।।


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