New Delhi News (16 September 2026): BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान दिल्ली में आयोजित गाला डिनर का मेन्यू इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत मंडपम में 12 सितंबर को BRICS मेहमानों के लिए आयोजित इस विशेष डिनर में पूरी तरह शाकाहारी भारतीय व्यंजन परोसे गए। मेन्यू में देश के अलग-अलग हिस्सों के पारंपरिक और क्षेत्रीय स्वादों को शामिल किया गया था। हालांकि, डिनर के वेजिटेरियन मेन्यू को लेकर अब राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है।
विवाद का एक प्रमुख कारण कांग्रेस नेता राहुल गांधी का 80 प्रतिशत भारतीयों के नॉन-वेज खाने से जुड़ा दावा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत की खाद्य विविधता को देखते हुए विदेशी मेहमानों के लिए नॉन-वेज विकल्प भी होना चाहिए था? वहीं, सरकारी सर्वे के आंकड़ों की व्याख्या को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
BRICS गाला डिनर में क्या-क्या परोसा गया?
BRICS मेहमानों के लिए आयोजित गाला डिनर में भारतीय खान-पान की क्षेत्रीय विविधता को शाकाहारी व्यंजनों के जरिए प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। मेन्यू में उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत और हिमालयी क्षेत्र तक के स्वादों को जगह दी गई।
स्टार्टर में खांडवी मिलेफॉय और खुंब गलौटी शामिल थे। खुंब गलौटी को पारंपरिक गलौटी कबाब की शाकाहारी शैली के तौर पर पेश किया गया, जिसमें मशरूम का इस्तेमाल किया गया।
मेन कोर्स में पनीर लबाबदार, गुच्छी मार्मिक, कैरट-बीन्स पोरियाल, थकाली बेले सारू, मिलेट पुलाव और चुकंदर रायता जैसे व्यंजन शामिल थे।
वहीं, डेजर्ट में पुरानी दिल्ली के स्वाद से प्रेरित फ्रूट क्रीम विद जलेबी और शहतूत फिरनी परोसी गई।
इस तरह मेन्यू केवल कुछ सामान्य शाकाहारी व्यंजनों तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के स्वाद और पारंपरिक भोजन को एक साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की गई।
राहुल गांधी के 80 प्रतिशत नॉन-वेज वाले दावे की क्या है सच्चाई?
गाला डिनर के पूरी तरह शाकाहारी होने के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि 80 प्रतिशत भारतीय नॉन-वेज खाना खाते हैं।
हालांकि, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों को देखने पर तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5), 2019-21 के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की उम्र के 83.4 प्रतिशत पुरुष और 70.6 प्रतिशत महिलाएं मछली, चिकन या मांस का सेवन रोजाना, साप्ताहिक या कभी-कभार करती थीं।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि भारत में नॉन-वेज खाने वाली आबादी काफी बड़ी है। लेकिन इसे पूरे भारतीय समाज की ठीक 80 प्रतिशत आबादी का आधिकारिक आंकड़ा कहना सही नहीं होगा, क्योंकि सर्वे का यह आंकड़ा एक विशेष आयु वर्ग के पुरुषों और महिलाओं से संबंधित है।
इसलिए 80 प्रतिशत का आंकड़ा एक मोटे अनुमान के तौर पर समझा जा सकता है, लेकिन इसे भारत की पूरी आबादी का सटीक सरकारी प्रतिशत बताना आंकड़ों की सही व्याख्या नहीं होगी।
सिर्फ वेज मेन्यू पर क्यों उठे सवाल?
गाला डिनर के मेन्यू को लेकर विपक्षी नेताओं ने भारत की खाद्य संस्कृति की विविधता का मुद्दा उठाया है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा समेत कुछ विपक्षी नेताओं ने सवाल किया कि जब भारत में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी भोजन करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के लिए नॉन-वेज विकल्प क्यों नहीं रखा गया।
विपक्ष का मूल तर्क यह है कि भारत की पहचान केवल शाकाहारी भोजन तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों और समुदायों में शाकाहारी के साथ-साथ मांसाहारी भोजन की भी लंबी परंपरा रही है।
हालांकि, किसी आधिकारिक डिनर में केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत की खाद्य विविधता को जानबूझकर छिपाया गया। ऐसे आयोजनों में मेन्यू का चयन मेजबान देश की ओर से कई बातों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।
कूटनीति, संस्कृति और प्रोटोकॉल के बीच मेन्यू का चयन
अंतरराष्ट्रीय स्तर के आधिकारिक डिनर में भोजन केवल खाने का विषय नहीं होता, बल्कि वह सांस्कृतिक प्रस्तुति और कूटनीतिक आतिथ्य का हिस्सा भी होता है। ऐसे आयोजनों में मेन्यू तय करते समय आयोजन की थीम, सांस्कृतिक प्रस्तुति, सुरक्षा और प्रोटोकॉल के साथ-साथ मेहमानों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
BRICS गाला डिनर में भी अलग-अलग भारतीय क्षेत्रों के शाकाहारी व्यंजनों को शामिल किया गया। इसलिए इस मेन्यू को एक तरफ जहां भारत की शाकाहारी पाक परंपरा की प्रस्तुति के तौर पर देखा जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं ने इसे भारत की व्यापक खाद्य विविधता के संदर्भ में सवालों से जोड़ा है।
80 प्रतिशत का दावा और गाला डिनर—दो अलग-अलग बहस
पूरे विवाद को समझने के लिए दो मुद्दों को अलग-अलग देखना जरूरी है। पहला, भारत में कितने लोग नॉन-वेज भोजन करते हैं, और दूसरा, BRICS गाला डिनर में केवल वेज भोजन क्यों परोसा गया।
NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि 15-49 आयु वर्ग में नॉन-वेज भोजन करने वालों की संख्या काफी अधिक है, लेकिन इससे पूरे देश की आबादी के लिए ठीक 80 प्रतिशत का आधिकारिक आंकड़ा नहीं निकलता। दूसरी ओर, गाला डिनर का वेज मेन्यू अपने आप में भारत की खाद्य संस्कृति पर कोई व्यापक निष्कर्ष साबित नहीं करता।
यही वजह है कि BRICS गाला डिनर का एक सामान्य डिनर मेन्यू अब भारत की खाद्य संस्कृति, सांस्कृतिक प्रस्तुति और राजनीतिक बयानबाजी के बीच बहस का विषय बन गया है।

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