आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के सेमिनार में समावेशी शिक्षा और शिक्षक सशक्तीकरण पर जोर

टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida News (13/09/2026): आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (AIE), ग्रेटर नोएडा और काउंसिल फॉर टीचर्स प्रोफेशनल डेवलपमेंट (CTPD), इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में 11 एवं 12 सितंबर 2026 को “समावेशन से सशक्तिकरण की ओर : विविधतापूर्ण अधिगम के लिए शिक्षा का रूपांतरण” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में देशभर से शिक्षाविदों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं ने सहभागिता करते हुए समावेशी शिक्षा, विविधतापूर्ण अधिगम, शिक्षक सशक्तीकरण और भविष्य की शिक्षा व्यवस्था को लेकर विचार साझा किए।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रथम दिन दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन की प्राचार्या डॉ. अभिलाषा गौतम ने स्वागत संबोधन में समावेशी शिक्षा को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए शिक्षकों को आवश्यक प्रशिक्षण एवं संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी की आवश्यकताओं और क्षमताओं को समझते हुए शिक्षा प्रदान करने में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, प्रभावी समावेशी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए शिक्षकों को बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप लगातार प्रशिक्षित और सशक्त किया जाना आवश्यक है।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं सेंटर फॉर जवाहरलाल नेहरू स्टडीज, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की डायरेक्टर प्रो. भारती शर्मा ने समावेशी शिक्षा के लिए स्पष्ट और प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें शिक्षकों का सशक्तीकरण, विविधता के प्रति सम्मान और प्रत्येक विद्यार्थी के लिए समान अवसर सुनिश्चित हो। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा तंत्र ऐसा होना चाहिए, जहां हर विद्यार्थी अपनी क्षमता और रुचि के अनुरूप सीखने तथा आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त कर सके।

सेमिनार की मुख्य वक्ता एमिटी विश्वविद्यालय की प्रो. जयंती पुजारी ने समावेशी शिक्षा को केवल एक शैक्षिक अवधारणा तक सीमित न रखते हुए इसे व्यापक शैक्षिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में विविधता को स्वीकार करना और प्रत्येक शिक्षार्थी की विशिष्ट आवश्यकताओं को समझना आज की प्रमुख आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षकों से विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं, सीखने की शैलियों और सामाजिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए शिक्षण पद्धतियों में आवश्यक बदलाव करने का आह्वान किया।

सेमिनार के विभिन्न तकनीकी सत्रों में लगभग 100 शिक्षकों और शोधकर्ताओं ने हाइब्रिड माध्यम से भाग लिया। प्रतिभागियों ने समावेशी शिक्षा, विविधतापूर्ण अधिगम, शिक्षक सशक्तीकरण और भविष्य की शिक्षा प्रणाली सहित विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन सत्रों में शिक्षा के बदलते स्वरूप, कक्षा-कक्ष में विविधता को समाहित करने की रणनीतियों और शिक्षकों की नई जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा हुई।

सेमिनार के दूसरे दिन प्रथम सत्र में गलगोटिया विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर प्रो. के. मल्लिकार्जुन बाबू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में गतिविधि-आधारित शिक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को केवल व्याख्यान के माध्यम से पढ़ाने के बजाय उन्हें विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल करना अधिक प्रभावी हो सकता है। उनके अनुसार, गतिविधियां शिक्षक और विद्यार्थी के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करती हैं और सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज एवं प्रभावी बनाती हैं।

प्रो. बाबू ने कहा कि विविधता को समझने और उसे सकारात्मक रूप से स्वीकार करने के लिए शिक्षकों में समानुभूति का होना आवश्यक है। उन्होंने भारत की “अनेकता में एकता” की भावना तथा “सत्यमेव जयते” जैसे मूल्यों को शिक्षा के व्यापक उद्देश्य से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, सह-अस्तित्व और समावेशी दृष्टिकोण में निहित है।

विशिष्ट अतिथि एवं एनसीईआरटी, नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनुपम आहूजा ने शिक्षा में समान अवसर के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे को समान वातावरण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है। उन्होंने कक्षा-कक्ष में किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचने तथा विद्यार्थियों को उनकी पृष्ठभूमि, क्षमता या अन्य किसी आधार पर अलग किए बिना सीखने के समान अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता बताई।

मुख्य वक्ता गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के शिक्षा विभाग के प्रो. अमित आहूजा ने बच्चों के सर्वांगीण विकास में परिवार की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि परिवार बच्चों के व्यक्तित्व, व्यवहार और मूल्यों के विकास की पहली पाठशाला है। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षक को केवल विषय पढ़ाने वाले अध्यापक तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘गुरु’ की भूमिका निभाने का प्रयास करना चाहिए, जिसका उद्देश्य विद्यार्थी के शैक्षणिक विकास के साथ उसके व्यक्तित्व और जीवन-मूल्यों का समग्र विकास सुनिश्चित करना है।

CTPD, इंडिया के प्रेसिडेंट डॉ. संजय कुमार ने शैक्षिक कार्यक्रमों में द्विभाषी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि द्विभाषी संप्रेषण के माध्यम से विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान अधिक सहज और प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने शिक्षा को अधिक समावेशी और विद्यार्थियों के अनुकूल बनाने में भाषा की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।

सेमिनार के दूसरे दिन के द्वितीय सत्र में “भविष्य-उन्मुख शिक्षा प्रणाली के लिए शिक्षकों का सशक्तीकरण” विषय पर विशेषज्ञ परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (NIEPA) के डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एंड नॉन-फॉर्मल एजुकेशन के प्रो. अमित गौतम, वनस्थली विद्यापीठ के शिक्षा विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अजय सुराना तथा जेपी पब्लिक स्कूल, ग्रेटर नोएडा की प्रिंसिपल मिस मीता भंडूला ने विशेषज्ञ के रूप में भाग लिया। विशेषज्ञों ने शिक्षक सशक्तीकरण, बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं, तकनीकी बदलावों और भविष्य की शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।

सेमिनार के दौरान शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षा एवं शिक्षण के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले CTPD, इंडिया से जुड़े शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इसी क्रम में आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के शिक्षकों को भी उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक एवं शिक्षण योगदान के लिए सम्मान प्रदान किया गया।

आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन की प्राचार्या डॉ. अभिलाषा गौतम को नेशनल अवॉर्ड फॉर एकेडमिक लीडरशिप 2026 से सम्मानित किया गया। वहीं डॉ. बबीता भारद्वाज, डॉ. रीतू रानी, डॉ. योगेश कुमार और मिस कोमल चौधरी को नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचिंग एक्सीलेंस प्रदान किया गया।

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन शिक्षा को अधिक समावेशी, समानतापूर्ण, संवेदनशील और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के संकल्प के साथ हुआ। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप सीखने, अपनी प्रतिभा विकसित करने और आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों।


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