मखाना बना भारत का ग्लोबल सुपरफूड, उत्पादन और निर्यात में आई तेजी

टेन न्यूज़ नेटवर्क

National News (19 August 2026): भारत का पारंपरिक मखाना अब तेजी से वैश्विक सुपरफूड के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, पौध-आधारित खाद्य पदार्थों की मांग और प्रीमियम स्नैक्स के बढ़ते बाजार ने मखाना क्षेत्र को नई रफ्तार दी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है और देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी करीब तीन-चौथाई है। वैश्विक आपूर्ति में भी भारत की हिस्सेदारी लगभग 80 से 85 प्रतिशत बताई गई है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल और असम में भी इसकी खेती होती है। मखाने की बढ़ती मांग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की आय और कृषि-खाद्य निर्यात को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

सरकार ने मखाना क्षेत्र को संगठित और आधुनिक बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की गई थी, जिसका औपचारिक शुभारंभ 15 सितंबर 2025 को बिहार में किया गया। इसके साथ ही 2025-26 से 2030-31 तक मखाना विकास के लिए 476.03 करोड़ रुपये की केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी गई है। योजना के तहत अनुसंधान एवं नवाचार, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का प्रशिक्षण, कटाई और कटाई के बाद की तकनीक, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा। 2025-26 के लिए 30 करोड़ रुपये और 2026-27 के लिए 90 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।

उत्पादन के मामले में भी मखाना क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2024-25 के अंतिम अनुमानों के अनुसार भारत में मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन था, जबकि 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में यह बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन हो गया। बिहार 60,000 मीट्रिक टन उत्पादन के साथ देश का प्रमुख उत्पादक बना हुआ है। उत्तर बिहार के कोसी बेसिन, मिथिला और सीमांचल क्षेत्र में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। आधुनिक खेती की तकनीकों और स्वर्ण वैदेही तथा सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों के इस्तेमाल से उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है। मिथिला मखाना को GI टैग मिलने से इसकी विशिष्ट पहचान और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रांडिंग की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं।

मखाने की घरेलू मांग में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। 2021-22 से 2024-25 के बीच घरेलू मखाना बाजार में करीब 17 से 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई। स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम स्नैक्स की मांग बढ़ने से मखाने की कीमतों में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। वर्ष 2020-22 के दौरान इसकी औसत कीमत करीब 500 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। देश में पॉप्ड मखाने की अनुमानित मासिक घरेलू खपत 3,000 से 3,500 मीट्रिक टन है, जो त्योहारों के दौरान करीब 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है। बाजार में ब्रांडेड कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी पैकेज्ड मखाने की मांग बढ़ रही है।

निर्यात के मोर्चे पर भी भारत की स्थिति मजबूत हुई है। मखाना उत्पादों के लिए 2025 में अलग HSN कोड जारी होने से निर्यात के आंकड़ों को अलग से दर्ज करना संभव हुआ। 2025-26 में भारत ने 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य 19,296.08 लाख रुपये रहा। अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख बाजार हैं और तीनों मिलकर करीब 77 प्रतिशत निर्यात हिस्सेदारी रखते हैं। वहीं जर्मनी, नेपाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में मात्रा कम होने के बावजूद प्रति किलोग्राम अधिक कीमत मिलती है। इससे संकेत मिलता है कि भारत के लिए प्रीमियम बाजारों में निर्यात बढ़ाने और मौजूदा बाजारों से आगे अपनी पहुंच का विस्तार करने की बड़ी संभावना है।

मखाना क्षेत्र में उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर भी जोर दिया जा रहा है। खेतों और तालाबों से बीज संग्रह के बाद सफाई, सुखाने, भूनने, पॉपिंग, ग्रेडिंग और पैकेजिंग की प्रक्रिया होती है। अब पारंपरिक पॉप्ड मखाने के अलावा फ्लेवर्ड मखाना, रेडी-टू-ईट स्नैक्स और मखाना आटा जैसे उत्पाद भी बाजार में आ रहे हैं। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (NRCM) उन्नत खेती, प्रसंस्करण और मशीनीकरण को बढ़ावा देने में भूमिका निभा रहा है। केंद्र ने किसानों और संस्थानों को उन्नत मखाना बीज वितरित किए हैं तथा हजारों किसानों को प्रशिक्षण दिया है। मखाना बीज वॉशर, ग्रेडर, रोस्टिंग मशीन और पॉपिंग मशीन जैसी तकनीकों को भी व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

मखाने की सबसे बड़ी ताकत उसका पोषण मूल्य भी है, जिसने इसे भारत से निकलकर वैश्विक हेल्थ-फूड बाजार में जगह दिलाने में मदद की है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं तथा इसमें वसा और सोडियम की मात्रा कम होती है। सरकार की योजनाओं के तहत 1,010 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मखाना खेती में लाया गया है और 2025-26 में 8,159 किसानों को योजना से लाभ मिला है। बढ़ती घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग, बेहतर प्रसंस्करण, मजबूत ब्रांडिंग और सरकारी सहायता के चलते मखाना आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोजगार पैदा करने और भारत के कृषि-खाद्य निर्यात को नई ऊंचाई देने वाला महत्वपूर्ण उत्पाद बन सकता है।


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