“पर्यावरण के दोहन से मानव अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट”: पर्यावरणविद् सुशील द्विवेदी | Ten Talks

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (29 July 2026): विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस के विशेष अवसर पर टेन न्यूज़ नेटवर्क द्वारा आयोजित ‘टेन टॉक्स’ कार्यक्रम में पर्यावरणविद् सुशील द्विवेदी ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर समाज और दुनिया को सचेत किया। उन्होंने पर्यावरण दोहन, प्राकृतिक आपदाओं, भविष्य की चुनौतियों तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लाभ और हानियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने युवाओं के लिए पर्यावरणीय शिक्षा, कर्तव्यबोध तथा प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया।

प्रश्न: हम पर्यावरण दोहन के किस पड़ाव पर खड़े हैं?

उत्तर: पिछले 100 वर्षों में पर्यावरण के साथ जो अत्याचार किए गए हैं, वे बहुत अधिक हैं। वर्ष 2020 के बाद स्थिति ऐसी बन गई है कि अब वापस लौट पाना बहुत मुश्किल है। आगे अब हमें सचेत रहकर संसाधनों का उपयोग करना होगा। धरती को बचाने के जो संकेत मिलते रहे, उन्हें पहचानने में हमने बहुत देर कर दी। ये संकेत कई वर्षों से मिल रहे थे, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाए। आज मैं और आप बात कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार देखें तो फ्रांस जैसे ठंडे प्रदेश में भी आग लगी हुई है। वहां के लोगों को सांस लेने का संकट हो रहा है।

पर्यावरण

प्रश्न: दोहन के इस स्तर पर पहुंच जाने के बाद वापसी का क्या मार्ग है?

उत्तर: वापसी का रास्ता अपनाने पर भी हमें पहले जैसी सुजलाम-सुफलाम धरती मिलने वाली नहीं है। अब हमें भी प्रकृति के अनुसार स्वयं को बदलना होगा। चूंकि हमने संकेतों से सबक नहीं लिया, इसलिए आगे आने वाले समय में सतर्क रहना होगा। जापान में अभी भूकंप आया है, जिससे सुनामी की स्थिति पैदा हो गई है। इसी तरह भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आज बाढ़ के कारण हाहाकार मचा है, जिससे 10 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। इसके लिए धरती का हर मनुष्य जिम्मेदार है।

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार की है या समाज भी आगे आए?

उत्तर: पुराने अनुभवों को उठाकर देखें तो कोई भी योजना तब तक सफल नहीं होती, जब तक आम जन उसमें हिस्सा न ले। आम व्यक्ति तब हिस्सा लेगा, जब उसे इस बात का एहसास होगा कि उसके जागने से लेकर सोने तक प्रकृति ने उसे सब कुछ अपनी गोद से दिया है। उन्हें समझना होगा कि धरती सबसे बड़ा गुरु है। जब कोई भी परेशानी महसूस करे तो यह अहसास करे कि प्रकृति के पास उसका समाधान है। यदि हमने इसे बचाने में योगदान नहीं दिया तो नुकसान हमारा ही होगा। भारत सरकार के मिशन लाइफ के तहत यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि आपका जीवन पर्यावरण के अनुकूल हो। इसमें हर व्यक्ति की भागीदारी आवश्यक है।

प्रश्न: पर्यावरण का दोहन करने वाली कारखानों और कंपनियों की जिम्मेदारी कितनी तय होनी चाहिए?

उत्तर: किसी ने कहा था कि यह धरती हमें वंशावली में प्राप्त नहीं हुई है, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है। जब कोई चीज उधार ली जाती है तो उसे अच्छे स्वरूप में लौटाना भी होता है। जो कंपनियां प्लांट लगा रही हैं और स्थानीय लोगों में संघर्ष हो रहा है, उसका कारण यह है कि पहले लोग जरूरत पूरी करने के लिए संसाधनों का उपयोग करते थे, लेकिन अब जीवन को आसान बनाने और विभिन्न गतिविधियों को पूरा करने के लिए खनिजों का दोहन कर मशीनों का निर्माण किया जा रहा है। मैं स्वयं बुंदेलखंड से आता हूं। मेरा बचपन वहीं बीता है। मैंने वहां की बदहाली अपनी आंखों से देखी है। वहां के माफिया रातों-रात पहाड़ खोदकर ले गए। नदियों की गोद को सूना कर दिया। इतना बालू निकाला गया कि पानी की भारी किल्लत होने लगी। वहां की वन संपदा भी बहुत अधिक प्रभावित हुई। आज बुंदेलखंड सूखा, अकाल और भुखमरी का पर्याय बनकर रह गया है। हमें प्राथमिकता तय करनी पड़ेगी कि हमें हीरा चाहिए या जीवन।

प्रश्न: Gen Z द्वारा पर्यावरण पर कितना गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए?

उत्तर: आज के दौर में भारत के पास सबसे बड़ी युवा संपदा है। देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी युवा है। यदि इन युवाओं को सही जीवनशैली सिखाई जाए, जैसा कि विद्यालय स्तर पर ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं, तो बहुत बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। यदि युवाओं में सही आदतें विकसित कर दी जाएं तो दुनिया में बड़ा परिवर्तन संभव है। वेदों में भी धरती को माता के रूप में पूजा गया है। ऐसे में बच्चों को अब अधिकारबोध की जगह कर्तव्यबोध सिखाया जाना चाहिए।

प्रश्न: भारत सरकार द्वारा स्वच्छ ऊर्जा और नमामि गंगे जैसी परियोजनाओं का प्रभाव कितना असरदार साबित होगा?

उत्तर: नमामि गंगे कार्यक्रम से पहले गंगा एक्शन प्लान एवं यमुना एक्शन प्लान जैसे कार्यक्रम वर्षों तक चलते रहे। करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन गंगा मैया की स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। जब तक हम स्वयं में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक कुछ भी कारगर नहीं होगा। एक तरफ हम नदियों की पूजा करते हैं, दूसरी तरफ अपने अवशिष्ट उनमें विसर्जित करते जा रहे हैं। लंदन की टेम्स नदी के कारण वहां की संसद की कार्यवाही तक बंद करनी पड़ी थी, लेकिन आज उसे इतना साफ कर दिया गया है कि उसमें तनिक भी दुर्गंध नहीं आती। इसी प्रकार राइन नदी का भी पुनरुद्धार किया गया।

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण के लिए तीन ठोस कदम क्या हो सकते हैं?

उत्तर: सबसे पहले सभी को अपने विशेष कार्यक्रमों और अवसरों पर पौधा लगाकर दुनिया को संदेश देना होगा। तभी हम एक सुंदर दुनिया बना सकते हैं। दूसरा, इस समय धरती पर सबसे बड़ी समस्या पानी को लेकर है। जैसा कहा भी जाता है कि यदि भविष्य में युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा। इस दुनिया में किसी के पास पानी नहीं है तो किसी के पास बहुत अधिक पानी है। जहां पानी अधिक है, वहां उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। इसलिए हमें समाज को पानी के प्रति सचेत करना होगा। पानी ऐसा प्राकृतिक तत्व है, जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जब भी किसी अन्य ग्रह पर कोई वैश्विक मिशन भेजा जाता है तो सबसे पहले वहां पानी की खोज की जाती है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा भी पानी है। हमारी युवा पीढ़ी को इसके प्रति शिक्षित करना होगा, ताकि आने वाले समय में एक बेहतर धरती का निर्माण हो सके। खाने की बर्बादी रोकनी होगी और पर्यावरण को होने वाली हानि को भी रोकना होगा।


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