मोदी सरकार के 12 साल में 4 शिक्षा मंत्री: क्या सचमुच ‘कांटों का ताज’ है शिक्षा मंत्रालय?

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (27 जुलाई 2026): केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्रालय को देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में गिना जाता है। यही मंत्रालय देश की शिक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालयों, स्कूलों और करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़े फैसले लेता है। लेकिन पिछले 12 वर्षों का राजनीतिक इतिहास देखें तो यह मंत्रालय जितना महत्वपूर्ण रहा है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी साबित हुआ है।

वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक चार नेताओं ने शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। इनमें से हर एक का कार्यकाल किसी न किसी बड़े विवाद, चुनौती या राजनीतिक बदलाव के साथ समाप्त हुआ। हाल ही में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह अतिरिक्त प्रभार प्रह्लाद जोशी को सौंपा गया है। ऐसे में एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या शिक्षा मंत्रालय वास्तव में ‘कांटों का ताज’ बन चुका है?

स्मृति ईरानी: पहला कार्यकाल, कई विवाद

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में 26 मई 2014 को स्मृति जुबिन ईरानी को तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा मंत्रालय) की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 5 जुलाई 2016 तक कुल 771 दिनों तक इस मंत्रालय का नेतृत्व किया।

उनके कार्यकाल के दौरान शैक्षणिक योग्यता, विश्वविद्यालयों से जुड़े विवाद और कई नीतिगत मुद्दों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही। बाद में उनका मंत्रालय बदल दिया गया। वर्तमान में अमेठी लोकसभा चुनाव हारने के बाद वह केंद्र सरकार में किसी बड़े मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं संभाल रही हैं।

प्रकाश जावड़ेकर: शिक्षा सुधारों के बीच राजनीतिक भूमिका सीमित

स्मृति ईरानी के बाद 5 जुलाई 2016 को प्रकाश जावड़ेकर को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने 30 मई 2019 तक यानी 1,059 दिनों तक मंत्रालय संभाला।

उनके कार्यकाल में कई शिक्षा सुधारों पर काम हुआ, लेकिन 2019 के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका सीमित होती चली गई। फिलहाल वह केंद्र सरकार में किसी प्रमुख मंत्रालय का हिस्सा नहीं हैं।

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’: कोरोना काल और नई शिक्षा नीति

30 मई 2019 को रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला। उनका कार्यकाल 7 जुलाई 2021 तक रहा, जो कुल 769 दिनों का था।

उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती कोविड-19 महामारी रही। इसी दौरान देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) लागू की गई, जिसे शिक्षा क्षेत्र का बड़ा सुधार माना गया। हालांकि बाद में स्वास्थ्य कारणों और मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। वर्तमान में उनके पास भी कोई बड़ी केंद्रीय जिम्मेदारी नहीं है।

धर्मेंद्र प्रधान: सबसे लंबा कार्यकाल, लेकिन अंत विवादों के बीच

7 जुलाई 2021 को धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने 25 जुलाई 2026 तक कुल 1,844 दिनों तक इस मंत्रालय का नेतृत्व किया, उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन, डिजिटल शिक्षा और कई सुधारात्मक कदम उठाए गए। हालांकि हाल के समय में प्रतियोगी परीक्षाओं, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के विरोध को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बढ़ता गया। अंततः 25 जुलाई 2026 को उन्होंने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

अब प्रह्लाद जोशी के सामने दो बड़ी चुनौतियां

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर राष्ट्रपति ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, उनके सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों में पैदा हुए असंतोष और अविश्वास को दूर करना। दूसरी, अपने मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी का प्रभावी ढंग से निर्वहन करना।

क्या शिक्षा मंत्रालय बन चुका है ‘कांटों का ताज’?

पिछले 12 वर्षों का रिकॉर्ड बताता है कि शिक्षा मंत्रालय संभालने वाले लगभग हर मंत्री को किसी न किसी बड़े विवाद, राजनीतिक चुनौती या कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि मंत्रालय संभालने वाला हर नेता राजनीतिक रूप से समाप्त हो जाता है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्रालय देश के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण मंत्रालयों में से एक है।

अब सबकी नजरें प्रह्लाद जोशी पर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने और मंत्रालय को नई दिशा देने में सफल होते हैं, या फिर यह जिम्मेदारी उनके लिए भी उतनी ही कठिन साबित होती है।।


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