ग्रेट निकोबार परियोजना पर कांग्रेस के गंभीर सवाल, कहा- आदिवासियों और पर्यावरण पर पड़ेगा प्रतिकूल असर

टेन न्यूज नेटवर्क

नई दिल्ली (27 मई 2026): ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट बंदरगाह परियोजना को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि इस परियोजना के लिए सरकार एक करोड़ से अधिक पेड़ काटने की तैयारी कर रही है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान होगा और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर भी खतरा पैदा हो जाएगा।

नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान पार्टी के एसटी विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि मोदी सरकार देशभर में आदिवासियों से उनकी जमीन और जंगल छीनने की नीति पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि चाहे अंडमान-निकोबार का ग्रेट निकोबार हो, ओडिशा का सिजिमाली हो या छत्तीसगढ़ का हसदेव क्षेत्र—हर जगह आदिवासी समुदायों को उनकी पारंपरिक जमीन और संसाधनों से बेदखल किया जा रहा है। सरकार प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों के हवाले करना चाहती है।

डॉ. भूरिया ने भाजपा सरकार को आदिवासी विरोधी बताते हुए कहा कि वर्तमान में ग्रेट निकोबार की कुल आबादी करीब 8 हजार है, लेकिन सरकार वहां बाहर से लगभग पांच लाख लोगों को बसाने की योजना बना रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के बाद वहां टाउनशिप और कैसीनो विकसित करने की तैयारी है। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि इस पूरी परियोजना के पीछे बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने की मंशा है।

उन्होंने कहा कि इस परियोजना से ग्रेट निकोबार में रहने वाली अत्यंत संवेदनशील शोम्पेन जनजाति के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। डॉ. भूरिया के अनुसार, दुनिया भर में शोम्पेन समुदाय की आबादी करीब 200 के आसपास ही बची है। उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार को यूनेस्को द्वारा बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया है, लेकिन केंद्र सरकार पर्यावरणीय संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर रही है।

कांग्रेस नेता ने परियोजना को भूगर्भीय दृष्टि से भी चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र अत्यधिक भूकंप संवेदनशील है और इतने बड़े स्तर पर आबादी बसाना लोगों की सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक साबित हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह देश के मौसम और मानसून के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यदि बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र खत्म हुआ तो इसका असर देश के मुख्य भूभाग के मौसम और पर्यावरण पर भी दिखाई दे सकता है।

डॉ. विक्रांत भूरिया ने यूनिफॉर्म सिविल कोड और डीलिस्टिंग जैसे मुद्दों को भी आदिवासी समुदायों की पहचान और संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आदिवासी समाज को विभाजित कर उनकी राजनीतिक और सामाजिक हिस्सेदारी कमजोर करना चाहती है। उन्होंने कहा कि अगर पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत संरक्षित क्षेत्र कम किए जाते हैं तो जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए बने कानून भी कमजोर पड़ जाएंगे।

दिल्ली में चल रही हाउसिंग लिस्टिंग प्रक्रिया का जिक्र करते हुए भी कांग्रेस ने सवाल उठाए। डॉ. भूरिया ने आरोप लगाया कि सरकारी स्तर पर आदिवासी समुदाय से जुड़े लोगों के नाम दर्ज करने में भी अनियमितताएं सामने आ रही हैं।

भाजपा सरकार द्वारा आदिवासी चेहरों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए जाने पर भी कांग्रेस ने सवाल खड़े किए। डॉ. भूरिया ने कहा कि यह केवल राजनीतिक दिखावा है, जबकि जमीनी स्तर पर आदिवासी इलाकों में जंगल कट रहे हैं और समुदायों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा आदिवासी कल्याण के लिए बड़े बजट के दावों पर पलटवार करते हुए कांग्रेस ने पूछा कि यदि इतना बजट दिया जा रहा है तो आदिवासी क्षेत्रों में अब भी गरीबी, कुपोषण और बुनियादी सुविधाओं की कमी क्यों बनी हुई है। डॉ. भूरिया ने कहा कि पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है और आदिवासी समाज आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

कांग्रेस ने केंद्र सरकार से ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर सभी पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं की दोबारा समीक्षा करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि विकास के नाम पर आदिवासियों की पहचान, उनके अधिकार और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी योजना पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाना चाहिए।


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