नई दिल्ली (27 मई 2026): राजधानी दिल्ली के हौजखास स्थित ‘काउज़ोन’ परिसर में राष्ट्रीय गौधन महासंघ के तत्वावधान में आगामी गौधन दीपावली मेला 2026 के सफल आयोजन को लेकर एक अहम रणनीतिक बैठक आयोजित की गई। बैठक में 1 से 7 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के इस कार्यक्रम की रूपरेखा, जनसहभागिता, गौ-संरक्षण, स्वदेशी अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। आयोजनकर्ताओं ने इसे केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि गौ-आधारित जीवनशैली और स्वदेशी सोच को समाज के केंद्र में लाने की बड़ी पहल बताया।
बैठक में असम के पूर्व राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी, राष्ट्र सेविका समिति की दिल्ली प्रांत संचालिका प्रो. चारू भसीन कालरा, राष्ट्रीय गौधन महासंघ के मुख्य संयोजक विजय खुराना, नरेंद्र चावला, मदन लाल, एन.सी. वाधवा और पूर्व विधायक राजेश सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। सभी वक्ताओं ने गौ-संरक्षण और उससे जुड़े आर्थिक, सामाजिक व पर्यावरणीय पहलुओं पर अपने विचार रखे।
अपने संबोधन में पूर्व राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था में गौ-आधारित जीवन पद्धति का हमेशा विशेष महत्व रहा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में बढ़ते पर्यावरण संकट, प्रदूषण और रासायनिक खेती से पैदा हो रही चुनौतियों के बीच गौ-आधारित प्राकृतिक जीवनशैली एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से गौधन की लगातार उपेक्षा हो रही है, आने वाले समय में दूध से ज्यादा गोमूत्र का महत्व और उसकी आवश्यकता महसूस की जाएगी। उन्होंने गोमूत्र को औषधीय दृष्टि से जीवनदायिनी बताते हुए समाज के सभी वर्गों से इस अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप देने की अपील की।
राष्ट्रीय गौधन महासंघ के मुख्य संयोजक विजय खुराना ने कहा कि गौधन दीपावली मेला 2026 केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने वाला एक व्यापक अभियान है। उन्होंने कहा कि गोबर आधारित उत्पाद, जैविक खेती, पंचगव्य, काउ डंग ब्रिकेटिंग मशीन और गौ-आधारित ऊर्जा मॉडल आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि महासंघ का उद्देश्य गौशालाओं को आत्मनिर्भर आर्थिक मॉडल के रूप में विकसित करना है, जिससे रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकें।
राष्ट्र सेविका समिति की दिल्ली प्रांत संचालिका प्रो. चारू भसीन कालरा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गौ केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और संवेदना की प्रतीक है। उन्होंने कहा कि गौ-संरक्षण सामाजिक चेतना, पारिवारिक संस्कार और पर्यावरणीय संतुलन से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सेवा, संवेदनशीलता और स्वदेशी जीवनशैली के प्रति जागरूकता को नई दिशा देते हैं।
बैठक में मेले के दौरान आयोजित होने वाली प्रदर्शनी, जनजागरूकता अभियान, स्वदेशी उत्पादों के प्रदर्शन, गौ-आधारित नवाचारों और महिलाओं व युवाओं की भागीदारी को लेकर विस्तृत रणनीति तैयार की गई। आयोजनकर्ताओं का कहना है कि नवंबर में होने वाला यह मेला गौ-संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्वदेशी अर्थव्यवस्था जैसे विषयों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित होगा।
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