काशी के तर्ज पर होगा दिल्ली में यमुना घाट का पुनर्विकास

टेन न्यूज स्टोरी

New Delhi News (07 May 2026): दिल्ली में यमुना किनारे स्थित ऐतिहासिक घाटों के पुनर्विकास को लेकर दिल्ली सरकार ने बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। काशी के गंगा घाटों की तर्ज पर यमुना घाटों को दिव्य, भव्य और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बनाने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। इसी कड़ी में यमुना बाजार क्षेत्र के पक्के 30 घाटों के आसपास बसे पंडा परिवारों और तीर्थ पुरोहितों को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन ने दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) और डीडीए कानून के तहत 310 घरों को खाली करने का नोटिस जारी किया है, जिसमें प्रभावित परिवारों को 15 दिनों के भीतर क्षेत्र खाली करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का उद्देश्य घाटों के आसपास हरियाली, स्वच्छता, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं और सुंदर धार्मिक वातावरण विकसित करना है।

इस फैसले के बाद दशकों से यमुना घाटों के किनारे रहने वाले पंडा परिवारों की चिंता बढ़ गई है। कई परिवारों का कहना है कि वे पिछले छह से सात पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं और उनकी आजीविका, धार्मिक कर्मकांड तथा सामाजिक पहचान पूरी तरह यमुना घाटों से जुड़ी हुई है। स्थानीय पंडा परिवारों ने सरकार से मांग की है कि यदि पुनर्विकास किया जा रहा है तो उन्हें घाटों से 300 मीटर के दायरे में ही पुनर्वास दिया जाए, ताकि वे धार्मिक कार्यों और श्रद्धालुओं की सेवा से जुड़े रह सकें। पंडा सुरेश चंद शर्मा ने कहा कि उन्हें घाटों के विकास से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हाई कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन होना चाहिए और प्रभावित परिवारों को घाटों के पास ही वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

यमुना बाजार के ये पक्के घाट ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इन घाटों का संबंध पांडव काल से जोड़ा जाता है, जबकि इनके निर्माण का प्रमाणिक इतिहास लगभग सौ वर्ष पुराना माना जाता है। पुरानी दिल्ली के कई धनाढ्य और धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों ने इन घाटों का निर्माण करवाया था। घाटों के ऊपर बने पुराने मकान और मोटी दीवारें आज भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाती हैं। यहां करीब 60 पंडा परिवार रहते हैं, जिनमें कई महिलाओं द्वारा भी धार्मिक गतिविधियों और घाटों के संचालन की जिम्मेदारी संभाली जाती है। घाटों पर बने मंदिर, यज्ञशालाएं और धार्मिक ढांचे इस पूरे क्षेत्र को आस्था का प्रमुख केंद्र बनाते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2006 में भी दिल्ली विकास प्राधिकरण ने यहां से लोगों को हटाने की कोशिश की थी। उस समय कुछ परिवारों ने बवाना में आवंटित जमीन स्वीकार कर ली थी, लेकिन अधिकांश पंडा परिवारों ने यमुना घाट छोड़ने से इनकार कर दिया था। मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने प्रभावित लोगों को घाटों के 300 मीटर के दायरे में पुनर्वास देने का निर्देश दिया था। स्थानीय निवासी उर्मिला शर्मा का कहना है कि लगभग 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी उस आदेश का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। अब एक बार फिर नोटिस जारी होने से लोगों में भय और असमंजस का माहौल है। कई परिवारों का कहना है कि अगर उन्हें घाटों से दूर बसाया गया तो उनकी पारंपरिक आजीविका समाप्त हो जाएगी।

यमुना घाटों के पुनर्विकास के साथ यहां मौजूद 50 से अधिक मंदिरों और यज्ञशालाओं को लेकर भी संशय की स्थिति बनी हुई है। प्रशासन ने फिलहाल इस पर स्पष्ट जानकारी नहीं दी है कि धार्मिक स्थलों का क्या होगा, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि उचित व्यवस्था की जाएगी। यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि काशी में घाटों के पुनर्विकास और सड़क चौड़ीकरण के दौरान मंदिरों को हटाने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। दिल्ली में भी कई धार्मिक संगठनों और स्थानीय लोगों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है। लोगों का कहना है कि विकास के साथ धार्मिक विरासत और आस्था का संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।

दिल्ली में भाजपा सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने यमुना की सफाई और घाटों के विकास को प्राथमिकता दी है। सरकार बनने के बाद उन्होंने यमुना आरती कर कार्यभार संभाला था और लगातार यमुना पुनर्जीवन अभियान पर जोर दिया जा रहा है। पूर्व उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना भी यमुना की स्वच्छता और सुंदरता को लेकर सक्रिय रहे हैं। कश्मीरी गेट स्थित कुदेसिया घाट को विकसित कर वासुदेव घाट का रूप दिया जा चुका है और अब उसी मॉडल पर यमुना बाजार के 30 घाटों को विकसित करने की तैयारी है। हालांकि, डीडीएमए कानून के तहत जारी नोटिस को लेकर स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं। निवासी नितिन शर्मा का कहना है कि आपदा प्रबंधन कानून में सीधे घर गिराने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला प्रशासन, स्थानीय निवासियों और धार्मिक संगठनों के बीच बड़ा मुद्दा बन सकता है।


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