New Delhi News (25 फरवरी 2026): दिल्ली शहर कई मुद्दों पर बंटा हुआ दिख सकता है, लेकिन कुछ बातों पर लगभग सभी की सहमति है, प्रदूषण खराब है, सरोजिनी नगर की शॉपिंग का अलग ही मज़ा है और मोमो अब सिर्फ खाना नहीं, एक इमोशन है। ग्रेटर कैलाश से लेकर बुराड़ी तक शाम का नज़ारा लगभग एक जैसा होता है, चांदी रंग की पेपर प्लेट, तीखी लाल चटनी, मेयोनीज़ और भाप उड़ाते गरमागरम मोमो।
आज मोमो के कई रूप हैं, तंदूरी, शेज़वान, अफगानी, चिली लेकिन औसत दिल्लीवासी की शाम अब इनके बिना अधूरी मानी जाती है। यह कभी “कच्चा खाना” कहकर ठुकराया गया व्यंजन अब शहर की पहचान बन चुका है।
लेकिन इस लोकप्रियता के बीच एक असहज सच्चाई भी है, जिस शहर ने मोमो को अपनाया, क्या उसने उन समुदायों को भी पूरी तरह अपनाया जिन्होंने इसे यहां तक पहुंचाया? हाल ही में अरुणाचल प्रदेश की तीन युवतियों के साथ कथित तौर पर नस्लीय दुर्व्यवहार की घटना सामने आई। वे अपने फ्लैट में एयर कंडीशनर लगवा रही थीं, ड्रिलिंग के दौरान मलबा नीचे गिर गया। मामूली विवाद माफी पर खत्म हो सकता था, लेकिन मामला कथित तौर पर नस्लीय टिप्पणियों और चरित्र पर सवाल उठाने तक पहुंच गया। यह सिर्फ हाउसिंग विवाद नहीं था, बल्कि पहचान पर हमला था।
दिल्ली में मोमो की शुरुआत तिब्बती, नेपाली और पूर्वोत्तर राज्यों से आए प्रवासियों ने की थी। तिब्बत और नेपाल से होते हुए यह व्यंजन सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और अन्य हिमालयी क्षेत्रों की संस्कृति का हिस्सा बना और फिर दिल्ली की गलियों में पहुंचा। शुरुआती दौर में पूर्वोत्तर और तिब्बती समुदायों द्वारा चलाए गए स्टॉल और दुकानों ने इसे लोकप्रिय बनाया। आज मज़नू का टीला और हुमायूंपुर जैसे इलाकों में यह भोजन संस्कृति का केंद्र बन चुका है। फूड ब्लॉगर और कॉलेज छात्र यहां की फूड ट्रेल को ट्रेंड बना चुके हैं।
खाने को लेकर कोई झिझक नहीं है, लेकिन लोगों को लेकर सवाल अब भी कायम हैं। “चिंकी” जैसे नस्लीय शब्द आज भी सुनाई देते हैं। अरुणाचल, मणिपुर, नागालैंड, नेपाल या भूटान के लोगों को शारीरिक बनावट के आधार पर एक जैसा मान लिया जाता है। “क्या आप भारतीय हैं?” जैसा सवाल अब भी पूछा जाता है। खासकर पूर्वोत्तर की महिलाओं को लेकर रूढ़िवादी और आपत्तिजनक धारणाएं आज भी समाज में मौजूद हैं।
ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। वर्ष 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानियम के साथ लाजपत नगर में मारपीट हुई थी, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी। इस घटना ने देशभर में आक्रोश पैदा किया और भेदभाव की जांच के लिए बेजबरुआ कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान और पुलिस संवेदनशीलता बढ़ाने की सिफारिशें की थीं।
हालांकि समय के साथ प्रतिनिधित्व बढ़ा है, पूर्वोत्तर का भोजन अब पहले की तरह “अलग” नहीं माना जाता, और युवा पीढ़ी खुलकर नस्लवाद का विरोध करती है। सोशल मीडिया ने भी ऐसे मामलों को सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन सामाजिक जागरूकता और सामाजिक सुरक्षा एक जैसी चीज़ें नहीं हैं।
दिल्ली खुद को प्रवासियों का शहर कहती है। यह पंजाबियों, बिहारी, बंगाली, दक्षिण भारतीय, अफगान और तिब्बती समुदायों को समेटे हुए है। फिर भी शारीरिक बनावट और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर भेदभाव कहीं न कहीं बना हुआ है। इसकी जड़ें अज्ञानता, रूढ़ियों और “दूसरा” ठहराने की मानसिकता में छिपी हैं।
खाना अपनाना आसान है, लोगों को अपनाना मुश्किल। अगर यह शहर सर्द शाम में फरमेंटेड बांस की खुशबू, स्मोक्ड पोर्क, थुकपा और पोर्क मोमो का आनंद ले सकता है, तो उसे उन पूर्वाग्रहों से भी सामना करना होगा जो अब भी उसके भीतर मौजूद हैं।
सवाल अब यह नहीं कि दिल्ली को सबसे अच्छे मोमो कहां मिलते हैं। सवाल यह है कि क्या दिल्ली प्लेट से आगे बढ़कर दिल तक स्वीकार करने के लिए तैयार है?।।
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