28 मार्च 1982 की वह रात: जब गांधी परिवार दो हिस्सों में बंट गया

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (12/02/2026): भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक नेहरू-गांधी परिवार के भीतर 28 मार्च 1982 की रात ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने परिवार की एकता को स्थायी रूप से प्रभावित किया। यह विवाद संजय गांधी की मृत्यु के बाद शुरू हुए राजनीतिक और पारिवारिक मतभेदों का परिणाम था।

जून 1980 में विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत के बाद परिवार में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया। उस समय 23 वर्ष की मेनका गांधी का मानना था कि संजय गांधी की राजनीतिक विरासत पर उनका अधिकार है। वहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़े बेटे राजीव गांधी को सक्रिय राजनीति में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

परिवार के भीतर धीरे-धीरे मतभेद गहराने लगे। बताया जाता है कि महत्वपूर्ण निर्णयों से मेनका गांधी को दूर रखा जाने लगा। इसी दौरान सोनिया गांधी इंदिरा गांधी के और करीब आती गईं। पारिवारिक संवाद कम होता गया और माहौल तनावपूर्ण हो गया।

1982 में लखनऊ में “संजय विचार मंच” की, एक सभा आयोजित की गई। उस समय इंदिरा गांधी ब्रिटेन के दौरे पर थीं। उन्होंने मेनका गांधी को इस कार्यक्रम में शामिल न होने की सलाह दी थी, क्योंकि इसे राजीव गांधी के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा था। इसके बावजूद मेनका गांधी सभा में पहुंचीं और भाषण दिया। इंदिरा गांधी की वापसी के बाद इस घटना को गंभीर राजनीतिक असहमति के रूप में लिया गया।

28 मार्च 1982 की रात विवाद चरम पर पहुंच गया। इंदिरा गांधी ने निर्देश दिया कि मेनका गांधी परिवार के साथ भोजन न करें और उनका खाना उनके कमरे में भेजा जाए। उसी शाम दोनों के बीच तीखी बहस हुई। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने मेनका गांधी से तत्काल प्रधानमंत्री आवास छोड़ने के लिए कहा।

जब मेनका गांधी ने इसे अपने पति का घर बताया, तो इंदिरा गांधी ने स्पष्ट किया कि यह प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास है। विवाद के बीच मेनका गांधी के सामान की तलाशी भी ली गई। आशंका जताई गई थी कि वे संजय गांधी से जुड़े कुछ दस्तावेज साथ ले जा सकती हैं।

उस समय, प्रधानमंत्री आवास के बाहर मीडिया मौजूद था। घटनाक्रम की जानकारी बाहर भी पहुंच रही थी। इसी बीच वरुण गांधी को लेकर भी विवाद सामने आया। इंदिरा गांधी अपने पोते को अपने पास रखना चाहती थीं, जबकि कानूनी सलाह के अनुसार मां का अधिकार प्राथमिक माना गया। अंततः रात लगभग 11 बजे मेनका गांधी अपने पुत्र वरुण गांधी को साथ लेकर प्रधानमंत्री आवास से निकल गईं।

इस घटना के बाद, गांधी परिवार के भीतर की दरार सार्वजनिक हो गई। आगे चलकर मेनका गांधी ने सक्रिय राजनीति में अलग राह चुनी। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसने परिवार और सत्ता के समीकरणों को प्रभावित किया।

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