टूटे शरीर में अटूट हौसला: मेजर होशियार सिंह की वह जंग, जिसे दुश्मन भी सलाम करता है
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (27/01/2026): 17 दिसंबर 1971… भारत-पाक युद्ध का सबसे कठिन दौर, पंजाब के शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर नदी के पास स्थित जरपाल पोस्ट दुश्मन के निशाने पर था। चारों ओर गोलियों की बारिश, टैंकों की गड़गड़ाहट और बारूद की गंध से भरा माहौल। इसी युद्धभूमि में भारतीय सेना के मेजर होशियार सिंह अपने अदम्य साहस के साथ डटे हुए थे।
पाकिस्तानी सेना के रेडियो संदेशों में यह चर्चा होने लगी थी कि जरपाल पोस्ट पर बैठा भारतीय अफसर कोई आम इंसान नहीं, बल्कि कोई ‘जिन’ है, जो इतनी भारी गोलाबारी के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं है। दुश्मन बार-बार हमला करता रहा, लेकिन हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी।
हरियाणा के सोनीपत जिले के सिसाना गांव में जन्मे मेजर होशियार सिंह ‘द ग्रेनेडियर्स’ रेजिमेंट के बहादुर अधिकारी थे। 15 दिसंबर की रात उन्हें जरपाल पोस्ट पर कब्जा करने का आदेश मिला था। यह इलाका बारूदी सुरंगों और आधुनिक पाकिस्तानी टैंकों से घिरा हुआ था। यह मिशन किसी “डेथ वारंट” से कम नहीं था।
युद्ध के दौरान एक तोप का गोला फटने से मेजर होशियार सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। शरीर से खून बह रहा था, लेकिन उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई। मेडिकल टीम ने उन्हें पीछे हटने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “मेरी लाश ही यहाँ से पीछे जाएगी।”
वे चलने की हालत में भी नहीं थे, फिर भी कोहनियों के बल रेंगते हुए एक मशीन गन पोस्ट से दूसरी पोस्ट तक जाते रहे। वे अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे और खुद मशीन गन संभालकर दुश्मन के हमलों को नाकाम करते रहे। घायल अवस्था में रहते हुए उन्होंने करीब 27 दुश्मन हमलों को असफल कर दिया।
जब गोला-बारूद लगभग खत्म होने लगा, तब उन्होंने रेडियो पर संदेश भेजा,
“दुश्मन मेरे सिर पर है, लेकिन मैं पीछे नहीं हटूंगा। हम आखिरी गोली तक लड़ेंगे।”
उनका यह जज्बा पूरे मोर्चे पर तैनात जवानों के लिए प्रेरणा बन गया। आखिरकार भारतीय सेना ने इस क्षेत्र पर कब्जा बनाए रखा और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
मेजर होशियार सिंह की महानता केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी। उन्होंने शहीद हुए पाकिस्तानी कमांडर कर्नल अकरम राजा का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ करवाया। यह दिखाता है कि वे दुश्मन की भी वीरता का सम्मान करते थे।
उनकी असाधारण बहादुरी, नेतृत्व और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया।
आज भी मेजर होशियार सिंह की कहानी भारतीय सेना के साहस और देशभक्ति की मिसाल है। टूटे शरीर के बावजूद न हार मानने वाला यह योद्धा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
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