National News (19 January 2026): अजमेर शरीफ दरगाह परिसर में शिव मंदिर होने के दावे से जुड़ा मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस विवाद में न्यायिक प्रक्रिया ने नया मोड़ ले लिया है। अजमेर सिविल न्यायालय ने महाराणा प्रताप सेना की ओर से दाखिल की गई याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि अब यह मामला विधिवत सुनवाई के चरण में प्रवेश कर चुका है। इस फैसले के बाद धार्मिक, सामाजिक और कानूनी हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
अदालत द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने के साथ ही इस पूरे प्रकरण में 21 फरवरी की तारीख तय की गई है। इस दिन सभी संबंधित पक्षों की संयुक्त रूप से सुनवाई होगी। अदालत के समक्ष हिंदू सेना और महाराणा प्रताप सेना दोनों अपने-अपने तर्क और साक्ष्य पेश करेंगे। यह सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इससे यह तय होगा कि आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
इस मामले में हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से किए गए उस दावे को भी आधार बनाया गया है, जिसमें उन्होंने अजमेर शरीफ दरगाह परिसर में शिव मंदिर होने की बात कही थी। इसी दावे को लेकर अदालत में अब विस्तार से सुनवाई होगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सभी पक्षों को समान अवसर दिया जाएगा, ताकि वे अपने ऐतिहासिक, धार्मिक और कानूनी तर्क मजबूती से रख सकें।
महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से दाखिल की गई याचिका में दरगाह परिसर से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और धार्मिक दावों का उल्लेख किया गया है। याचिका में मांग की गई है कि इन तथ्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और साक्ष्यों के आधार पर सच्चाई सामने लाई जाए। अदालत द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने के बाद यह साफ हो गया है कि न्यायालय इस मामले को गंभीरता से परखना चाहता है।
इस प्रकरण में राज्यवर्धन सिंह परमार को प्रथम पक्षकार बनाया गया है। परमार का दावा है कि उन्होंने इस विषय से जुड़े प्रमाण जुटाने के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर जो साक्ष्य उन्होंने एकत्र किए हैं, उन्हें वे अदालत के सामने मजबूती से प्रस्तुत करेंगे। परमार के अनुसार उनका उद्देश्य किसी तरह का विवाद खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई को सामने लाना है।
इस विवाद का इतिहास वर्ष 2022 से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। उस समय भी अजमेर शरीफ दरगाह परिसर में शिव मंदिर होने के दावे को लेकर एक याचिका दाखिल की गई थी, जिससे यह मामला पहली बार कानूनी दायरे में आया था। हालांकि उस दौर में मामला आगे नहीं बढ़ पाया, लेकिन अब नई याचिका के स्वीकार होने से यह मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
21 फरवरी को होने वाली सुनवाई पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं। अदालत किन तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता देती है, यह आगे की कानूनी दिशा तय करेगा। यह मामला न केवल अजमेर बल्कि पूरे देश में धार्मिक आस्था, इतिहास और कानून से जुड़ी एक बड़ी बहस को जन्म दे सकता है, जिसका असर आने वाले समय में व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।।
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