ग्रेटर नोएडा में संपत्ति विवाद: दबंगों के आगे बेबस पुलिस?, सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर उठे सवाल

टेन न्यूज नेटवर्क

Greater Noida News (13/01/2026): ग्रेटर नोएडा में एक गंभीर संपत्ति विवाद (Property Dispute) ने उत्तर प्रदेश सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति (Zero Tolerance Policy) पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि दबंगों ने पुलिस से कथित सांठगांठ कर करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने का प्रयास किया। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ के सचिव संजय प्रसाद ने एडिशनल पुलिस कमिश्नर गौतमबुद्ध नगर राजीव नारायण मिश्रा को निष्पक्ष जांच के निर्देश देते हुए पत्र लिखा, इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। पीड़ित रविंद्र पाल सिंह लगातार उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उनकी शिकायतों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही है।

NTPC SAS LTD (आनंदम) सोसाइट से जुड़ा मामला

पीड़ित रविंद्र पाल सिंह ने बताया कि यह मामला NTPC SAS LTD (आनंदम) सोसाइटी, ग्रेटर नोएडा में स्थित एक संयुक्त स्वामित्व वाले मकान के सौदे से जुड़ा हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस सौदे में उनके साथ धोखाधड़ी, दबाव और धमकी दी गई। रविंद्र पाल सिंह का कहना है कि बार-बार शिकायत देने के बावजूद पुलिस ने मामले को सिविल विवाद बताकर निस्तारित कर दिया, जबकि इसमें गंभीर आपराधिक तत्व शामिल हैं। न तो किसी स्तर पर आपराधिक जांच की गई और न ही अब तक किसी प्रकार की कार्रवाई सामने आई है।

पीड़ित के अनुसार इस पूरे प्रकरण में मुख्य सचिव द्वारा लिखा गया पत्र भी बेअसर साबित हुआ। जब शासन के शीर्ष स्तर से निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह स्थिति नीति और उसके अमल के बीच के अंतर को उजागर करती है और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

3.64 करोड़ रुपये के एग्रीमेंट से 1.76 करोड़ तक का फर्जी खेल

रविंद्र पाल सिंह ने आरोप लगाया है कि पुलिस इस मामले में दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को संरक्षण दे रही है। उनका कहना है कि 90 दिनों की समयसीमा के बावजूद रजिस्ट्री नहीं की गई, सौदे की कीमत जानबूझकर घटाने का दबाव बनाया गया और पुलिस की कथित मिलीभगत से प्रॉपर्टी के मूल दस्तावेज छीनने के साथ-साथ अवैध कब्जे का प्रयास किया गया। पीड़ित के अनुसार, अपराधियों ने सुनियोजित षड्यंत्र के तहत 3.64 करोड़ रुपये के एग्रीमेंट के कागजों के बीच दो टाइप किए गए ऐसे पेपर रख दिए, जिनमें पहले से रिक्त स्थान थे। बाद में इन्हीं कागजों का इस्तेमाल कर 1.76 करोड़ रुपये का एक नया एग्रीमेंट तैयार कर लिया गया, जिसमें स्टाम्प पेपर और अंतिम पृष्ठ, जिस पर गवाहों के हस्ताक्षर हैं, जोड़ दिए गए।

पीड़ित का आरोप है कि दोनों एग्रीमेंट में स्टाम्प पेपर और गवाहों के हस्ताक्षर वाला अंतिम पृष्ठ एक ही है। इन्हीं दस्तावेजों का उपयोग अलग-अलग समय पर कर मकान मालिक, पुलिस और बैंक को गुमराह किया गया। कभी 3.64 करोड़ के एग्रीमेंट के रूप में और कभी 1.76 करोड़ के एग्रीमेंट के रूप में इन कागजों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि इसी फर्जी एग्रीमेंट के आधार पर बैंक से लोन भी करा लिया गया। अब सोसाइटी से कथित फर्जी एनओसी बनवाकर अथॉरिटी से टीएम कराने का दबाव बनाया जा रहा है और 1.76 करोड़ रुपये में रजिस्ट्री कराने के लिए प्रॉपर्टी डीलर हरेंद्र तोंगड़ द्वारा दबाव डाला जा रहा है।

रविंद्र पाल सिंह ने यह भी बताया कि सौदे की शुरुआत में उनसे 56 लाख रुपये एडवांस के तौर पर लिए गए। संयुक्त नाम के मकान के बावजूद उन्होंने मना करने के बाद भी पूरी राशि उनके अकेले खाते में ट्रांसफर कराई गई, जबकि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि रकम आधी-आधी ट्रांसफर की जाए। इसके बाद दबाव बनाकर 3.64 करोड़ रुपये में सौदा तय किया गया, लेकिन एडवांस लेने के बाद एग्रीमेंट के भीतर रिक्त स्थान वाले कागजों का इस्तेमाल कर 1.76 करोड़ रुपये का फर्जी दस्तावेज तैयार करा लिया गया।

धमकी, गाली-गलौज और जबरन हस्ताक्षर करने के आरोप

पीड़ित ने आरोप लगाया कि उन्हें बुलाकर गाली-गलौज की गई, धमकियां दी गईं और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया। इसके साथ ही दस्तावेजों पर जबरन हस्ताक्षर कराने का भी प्रयास किया गया। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

पुलिस का पक्ष आना बाकी

इस मामले को लेकर टेन न्यूज़ नेटवर्क की टीम ने थाना बीटा-2 के थाना प्रभारी से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका। पुलिस का पक्ष सामने आते ही उसे इस खबर में शामिल किया जाएगा।

क्या निष्पक्षता और जवाबदेही की कसौटी पर प्रशासन

शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई न होना और जांच में आपराधिक पहलुओं को दरकिनार किया जाना प्रशासन की निष्पक्षता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। यह मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति की वास्तविक परीक्षा बन चुका है। जब मुख्य सचिव स्तर के निर्देश भी असरहीन नजर आएं, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रशासन निष्पक्षता और जवाबदेही की कसौटी पर कब और कैसे खरा उतरेगा। पीड़ित ने एक बार फिर न्याय और सुरक्षा की मांग दोहराई है।।

 


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