गरुड़ पुराण में बताए गए 5 महापाप: मृत्यु के बाद आत्मा को कैसे मिलती है सजा?

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (13/01/2026): सनातन धर्म में गरुड़ पुराण एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे अक्सर “मृत्यु के बाद का संविधान” कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसी किताब है जो बताती है कि मरने के बाद आत्मा के साथ क्या होता है। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच हुई बातचीत दी गई है। इसमें बताया गया है कि शरीर की मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह एक बदलाव है। जैसे हम पुराने कपड़े बदलकर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरी यात्रा पर निकल जाती है। इस यात्रा के दौरान, इंसान ने जीवन भर जो भी अच्छे या बुरे काम किए होते हैं, उनका हिसाब-किताब किया जाता है।

पहला महापाप भ्रूण हत्या को माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, एक आत्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद बड़ी मुश्किल से मनुष्य बनने का मौका पाती है। गर्भ में ही उस जीवन को खत्म कर देना ईश्वर की योजना में दखल देना माना जाता है। इसकी सजा के तौर पर ‘कुंभीपाकम नरक’ में आत्मा को खौलता हुआ ताप सहना पड़ता है, जो उसे उस दर्द का एहसास कराता है जो उस नन्ही जान ने महसूस किया होगा।

किसी भी महिला के साथ दुर्व्यवहार, शारीरिक शोषण या उसकी मर्जी के बिना उसे प्रताड़ित करना घोर पाप की श्रेणी में आता है। गरुड़ पुराण कहता है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं सुख-शांति रहती है। ऐसे पापियों को ‘तामसिक लोक’ के घने अंधेरे में भेजा जाता है, जहाँ उन्हें गर्म लोहे की कड़ियों से जकड़ दिया जाता है। यह सजा उनके द्वारा किए गए गलत स्पर्श और मर्यादा को ठेस पहुँचाने के बदले में दी जाती है।

भरोसा तोड़ना या किसी मासूम को फंसाने के लिए अदालत में झूठी गवाही देना तीसरा बड़ा पाप है। चूँकि विश्वासघाती व्यक्ति अपनी बातों से दूसरों को ‘डसने’ का काम करता है, इसलिए उसे ‘महारौरव नरक’ में भेजा जाता है। यहाँ जहरीले सांप और बिच्छू उस आत्मा को बार-बार डसते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि उसने दुनिया में दूसरों का भरोसा कैसे तोड़ा था।

अपने माता-पिता या गुरु को बोझ समझना, बुढ़ापे में उन्हें बेसहारा छोड़ देना या उनसे बदतमीजी से बात करना एक बड़ा अपराध माना गया है। ऐसे लोगों के लिए ‘कालसूत्र नरक’ बना है, जो एक तपते हुए रेगिस्तान जैसा है। यहाँ न पानी मिलता है और न ही छाया। यह प्यास और अकेलापन उस सूखेपन को दर्शाता है जो उस व्यक्ति ने अपने माता-पिता के जीवन में दिया था जब उन्हें प्यार और सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी।

मुसीबत के समय किसी ने भरोसे पर अपनी जमीन, गहने या जमापूँजी आपके पास रखी हो और आप उसे धोखे से हड़प लें, तो यह पाँचवाँ महापाप है। इसकी सजा ‘अवीची नरक’ में मिलती है, जहाँ आत्मा एक ऊँची पहाड़ी से गहरी खाई में गिरती रहती है। यह गिरना इंसान के चरित्र के पतन को दिखाता है। उसे तब तक शांति नहीं मिलती जब तक कि उसके द्वारा हड़पे गए धन का हिसाब पूरा न हो जाए।

गरुड़ पुराण यह भी कहता है कि अगर किसी से अनजाने में पाप हो गया है, तो जीवित रहते हुए प्रायश्चित यानी माफी माँगना और गलती सुधारना करना ही सबसे बड़ा रास्ता है।

गरुड़ पुराण का असली उद्देश्य हमें डराना नहीं, बल्कि एक सही और ईमानदार जीवन जीने की प्रेरणा देना है। भगवान विष्णु समझाते हैं कि जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं, तब तक “प्रायश्चित” यानी अपनी गलतियों को सुधारने का मौका हमेशा रहता है। सच्चा प्रायश्चित केवल पछतावा करना नहीं है, बल्कि अपनी गलती मानकर दूसरों से माफी माँगना, किसी का हड़पा हुआ धन लौटाना और समय रहते अपने माता-पिता के साथ रिश्तों को फिर से मधुर बनाना है। यह ग्रंथ हमारे लिए एक आईने की तरह काम करता है, जो हमें अपनी अंतरात्मा की बात सुनने और अच्छे कर्म करने की सीख देता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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