National News (11/01/2026): पिछले कुछ सालों में दुनिया भर के देशों के पैसों के लेन-देन और राजनीति में एक बड़ा बदलाव आ रहा है, जिसे ‘डीडॉलराइजेशन’ (De-Dollarization) कहा जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया अब व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहती है। हाल ही में अमेरिका ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए ‘रशिया सेंशंस बिल 2025’ पेश किया और वेनेजुएला पर भी दबाव बनाया। इन सब घटनाओं के पीछे एक बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि अमेरिका चाहता है कि पूरी दुनिया में उसके डॉलर का दबदबा पहले की तरह ही बना रहे और कोई उसे चुनौती न दे सके।
अमेरिकी डॉलर की ताकत की कहानी 1944 के ‘ब्रेटन वुड्स’ नाम के एक बड़े समझौते से शुरू हुई थी। लेकिन डॉलर को असली ताकत 1970 के आसपास मिली, जब अमेरिका ने सऊदी अरब जैसे तेल बेचने वाले देशों के साथ एक खास डील की, जिसे ‘पेट्रोडॉलर’ सिस्टम कहा गया। इस डील में यह तय हुआ कि दुनिया का कोई भी देश अगर तेल खरीदेगा, तो उसे बदले में सिर्फ डॉलर ही देने होंगे। इसके बदले में अमेरिका ने इन देशों को सेना के जरिए सुरक्षा देने का वादा किया। अब चूंकि तेल हर देश की जरूरत थी, इसलिए हर देश के लिए अपने पास डॉलर जमा करके रखना एक मजबूरी बन गया।
आज दुनिया के कई देश डॉलर पर अपना भरोसा कम करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि चीन जैसी ताकतें अब बहुत मजबूत हो गई हैं और अपनी मुद्रा ‘युआन’ में व्यापार को बढ़ावा दे रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब रूस ने भारत और चीन को सस्ते दामों पर तेल देना शुरू किया, तो इसका भुगतान डॉलर के बजाय उन्हीं देशों की अपनी मुद्राओं में किया गया। भारत भी ‘वोस्ट्रो अकाउंट’ जैसे तरीकों से रुपये में लेन-देन बढ़ा रहा है ताकि हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिकी फैसलों या नीतियों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रह सके।
अमेरिका को इस बात की चिंता है कि अगर दुनिया में डॉलर का इस्तेमाल कम हो गया, तो उसकी ताकत भी कम हो जाएगी. इसी वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ब्रिक्स देशों ने अपनी कोई नई करेंसी बनाई या डॉलर को छोड़कर आपस में व्यापार किया, तो वे उन देशों के सामान पर 100% टैक्स लगा देंगे.
पूरी दुनिया के पैसों के लेन-देन का तरीका अब बदल रहा है। एक तरफ भारत और चीन जैसे देश अपनी आर्थिक मजबूती के लिए डॉलर के बजाय दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका अपनी ताकत और सेना के दम पर डॉलर का दबदबा बनाए रखने के लिए काफी सख्त रुख अपना रहा है. आने वाले समय में यह ‘पैसों की लड़ाई’ ही तय करेगी कि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर किसका राज होगा.
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