एयर क्वालिटी और इम्यूनिटी: बढ़ता पॉल्यूशन कैसे कमजोर कर रहा है आपकी बॉडी का डिफेंस सिस्टम?

लेखक: डॉ. अंकुश त्यागी, फिजिशियन, कैलाश अस्पताल, जेवर

GREATER NOIDA News (08/0/2026): पिछले कुछ सालों में, हवा की बिगड़ती क्वालिटी लोगों की हेल्थ के लिए एक बहुत बड़ा, लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला खतरा बनकर उभरी है। ज्यादातर लोग प्रदूषण को केवल खांसी या सांस लेने में तकलीफ जैसी मौसमी बीमारियों से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इसका असली और लॉन्गटर्म नुकसान यह है कि यह चुपचाप हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को कमजोर करता रहता है। डॉक्टरी नजरिए से और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दृष्टि से देखें तो, यह बात अब साफ-साफ दिखाई दे रही है कि प्रदूषित हवा और कमजोर होते इम्यून सिस्टम का गहरा संबंध है, जो मरीजों की बढ़ती संख्या में साफ होता जा रहा है।

हवा की क्वालिटी और इम्यूनिटी के संबंध को समझना

हमारा रोग प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) शरीर का नेचुरल रक्षक है। यह शरीर में एंट्री करने वाले हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और जहरीले पदार्थों को पहचानकर उन्हें ख़त्म करता है। हालांकि, इस सिस्टम को अपना काम सही तरीके से करने के लिए, इसे रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं, सूजन संबंधी प्रतिक्रियाओं और सांस की नली जैसी सुरक्षात्मक परतों के बीच एक बैलेंस बनाए रखने की जरूरत होती है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक लगातार प्रदूषित हवा के कॉन्टेक्ट में रहता है, तो यह जरूरी बैलेंस बिगड़ जाता है, जिससे हमारा सुरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है।

वायु प्रदूषण में कई बेहद खतरनाक चीजें शामिल होती हैं, जैसे कि बारीक कण (PM2.5 और PM10), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और जहरीली धातुएं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि इन्हें आंख से देखना मुश्किल है, पर ये सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं और वहां से खून की नली में भी जा सकते हैं। यह प्रवेश पूरे शरीर में सूजन (Inflammation) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (कोशिकाओं को नुकसान) पैदा करता है। जब शरीर को लगातार अंदर से इस तरह के हमले का सामना करना पड़ता है, तो धीरे-धीरे इम्युन सिस्टम की क्षमता और मजबूती पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

लगातार सूजन: इम्यून सिस्टम का साइलेंटली कमजोर होना

लंबे समय तक पॉल्यूश के टच में रहने का सबसे बड़ा नतीजा होता है—लगातार रहने वाली, धीमी-धीमी सूजन (Chronic Inflammation)। क्लीनिकल मामलों में, जो मरीज ज़्यादा प्रदूषण वाले इलाकों में रहते हैं, वे अक्सर इन समस्याओं की शिकायत करते हैं: बार-बार इन्फेक्शन होना, किसी चोट या बीमारी का ठीक होने में ज़्यादा समय लगना, और पहले से मौजूद बीमारियां जैसे अस्थमा, एलर्जी और ऑटोइम्यून (जब शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करता है) कंडीशन्स का बढ़ जाना। यह लगातार बनी रहने वाली सूजन ही हमारे इम्यून सिस्टम को अंदर से खोखला कर देती है।

इसका मुख्य कारण यह है कि सांस के साथ अंदर गए डर्ट पार्टिकल्स को बाहर निकालने के लिए इम्यून सिस्टम को लगातार पूरी तैयारी और चौकसी की स्थिति में रहना पड़ता है। जब ये रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं (Immune Cells) लगातार एक्टिव रहती हैं, तो वे वास्तविक संक्रमणों (जैसे वायरस या बैक्टीरिया) से निपटने में अपनी कुछ कैपेबिलिटी खो देती हैं। इस प्रोसेस को अक्सर ‘इम्यून एग्जॉशन’ (Immune Exhaustion) या प्रतिरक्षा थकान कहा जाता है। इस थकान के कारण, शरीर की समय पर वायरल और बैक्टीरियल इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।

लंग्स की सेफ्टी और फर्स्ट लाइन इम्युनिटी

हमारा सांस लेने का सिस्टम (Respiratory System) हवा में मौजूद रोगाणुओं (Pathogens) के खिलाफ शरीर की फर्स्ट सेफ्टी लाइन होता है। स्वस्थ लोगों की सांस की नलियों पर बलगम (Mucus) की एक परत होती है और साथ ही छोटे-छोटे बाल जैसी संरचनाएं होती हैं, जो हानिकारक कणों को फंसा कर बाहर निकाल देती हैं। हालांकि, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहता है, तो यह प्रोटेक्टिव लेयर धीरे-धीरे खराब होने लगती है, जिससे बाहरी हमले को रोकना मुश्किल हो जाता है।

मेडिकल के नजरिए से देखा जाए तो इस तरह का नुकसान ही यह समझाता है कि क्यों प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों को सांस से जुड़े इन्फेक्शन (Respiratory Infections), ब्रोंकाइटिस, साइनस की समस्याएं और निमोनिया जैसी बीमारियां ज्यादा होती हैं। जब सांस की नली की सुरक्षात्मक परत (Airway Barrier) कमजोर हो जाती है, तो रोगाणुओं (Pathogens) को शरीर के अंदर जाने का आसान रास्ता मिल जाता है। इससे इन्यून सिस्टम पर ज्यादा दबाव पड़ता है, क्योंकि उसे अब और भी ज़्यादा काम करना पड़ता है।

पॉल्यूशन और इम्यून सेल की खराबी

नए क्लीनिकल रिसर्च (Clinical Research) बताते हैं कि वायु प्रदूषण सीधे तौर पर जरूरी रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं (Immune Cells) के काम में बाधा डालता है। उदाहरण के लिए, मैक्रोफेज कोशिकाएं, जो रोगाणुओं को निगलकर उन्हें खत्म करने का काम करती हैं, वे प्रदूषक कणों से इतनी भर जाती हैं कि उनकी इन्फेक्शन को साफ करने की क्षमता कम हो जाती है। इसी तरह, लिम्फोसाइट्स कोशिकाएं, जो इम्यून मेमोरी और लॉन्ग टर्म प्रॉटेक्शन में अहम भूमिका निभाती हैं, उनका काम भी गड़बड़ा जाता है।

बच्चों और बुज़ुर्गों पर विशेष खतरा

प्रदूषण से होने वाली यह रुकावट बच्चों और बुज़ुर्गों जैसे कमजोर ग्रुप्स के लिए विशेष रूप से चिंता का विषय है। बच्चों का इम्यून सिस्टम अभी पूरी तरह डेवलप हो रहा होता है, जबकि बुज़ुर्गों की प्रतिरोधक क्षमता उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से कम होती जाती है। इन दोनों ही मामलों में, प्रदूषित हवा इम्यून सिस्टम को कमज़ोर करने की प्रक्रिया को तेज कर सकती है और उन्हें बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना सकती है।

वैक्सीनेशन और इन्फेक्शन के प्रति कमजोर प्रतिक्रिया

स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में चिंता का एक और बढ़ता विषय यह है कि प्रदूषण का असर रोग प्रतिरोधक स्मृति (Immune Memory) पर पड़ सकता है। एक कमज़ोर इम्यून सिस्टम इन्फेक्शन या वैक्सीनेशन के बाद पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडी नहीं बना पाता है। मेडिकल के नज़रिए से, इसका मतलब है कि सुरक्षा का लेवल कम हो सकता है और दोबारा इन्फेक्टेड होने की संभावना बढ़ सकती है, खासकर मौसमी वायरल बीमारियों के प्रकोप के दौरान।

सबसे ज़्यादा खतरे में कौन हैं?

हेल्थ केयर देने वाले डॉक्टर यह देख रहे हैं कि खराब हवा की क्वालिटी का असर सब पर एक जैसा नहीं होता। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों और पहले से ही हृदय, फेफड़ों या मेटाबॉलिक (चयापचय) संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को काफी ज़्यादा खतरा होता है। इसके अलावा, शहरों में रहने वाले लोग, खासकर वे जो भारी ट्रेफिक वाले रास्तों या इंडस्ट्रीयल एरिया के करीब रहते हैं, वे भी इस पॉल्यूशन से असामान्य रूप से ज़्यादा प्रभावित होते हैं।

प्रीवेंटिव हेल्थकेयर की भूमिका

हेल्थ केयर के दृष्टिकोण से, प्रदूषण से होने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता की क्षति (Immune Damage) से निपटने के लिए हमें बचाव और पूरी हेल्थ पर फोकस करने की ज़रूरत है। इसके लिए, रेगुलर हेल्थ चेकअप, फेफड़ों की कार्यक्षमता का आकलन और सूजन से जुड़ी कंडीशन का जल्दी पता लगाना बहुत जरूरी है। प्रदूषित वातावरण में, बैलेंस्ड खाना, पर्याप्त नींद, फिजिकल एक्टिविटीज और समय पर वैक्सीनेशन के माध्यम से अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना और भी ज़्यादा जरूरी हो जाता है।

इस बचाव की प्रक्रिया में सबसे जरूरी पहलुओं में से एक है मरीज़ों को जागरूक करना। डॉक्टर अब लोगों को यह सलाह दे रहे हैं कि उन्हें घर से बाहर कब कम निकलना चाहिए, मास्क और एयर प्यूरीफायर जैसे सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल कैसे करना है, और बार-बार होने वाले सांस संबंधी या रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े लक्षणों के मामले में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। यह जागरूकता ही लोगों को प्रदूषण के खतरनाक प्रभावों से बचने में मदद करती है।

वायु प्रदूषण अब केवल एक पर्यावरण संबंधी चिंता नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर क्लीनिकल समस्या बन गया है जिसका लोगों के इम्यून सिस्टम (Immune System) पर सीधा असर पड़ रहा है। जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ रहा है, डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस में ऐसे मरीज़ों की बढ़ती संख्या देख रहे हैं जिन्हें बार-बार इन्फेक्शन हो रहा है, जिनमें लगातार सूजन है, और जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता लंबे समय से खराब है। इस गंभीर स्थिति से निपटने का एकमात्र रास्ता एक एक्टिव अप्रोच अपनाना है। इसमें  मेडिकल नॉलेज, रोकथाम के उपाय और पब्लिक अवेयरनेस को मिलाना होगा, ताकि शरीर के नेचुरल सुरक्षा तंत्र को न केवल बचाया जा सके, बल्कि हमारी कम्युनिटी भी स्वस्थ और एनवायरमेंटल बदलावों का सामना करने के लिए ज्यादा प्रतिरोधी बन सकें।


Discover more from टेन न्यूज हिंदी

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

टिप्पणियाँ बंद हैं।