National News (01/01/2026): राजस्थान के सीकर जिले में बना खाटू श्याम मंदिर आज करोड़ों लोगों के आस्था का केंद्र है। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि एक ऐसे महान बलिदान की कहानी है जो महाभारत के युद्ध से पहले हुआ था। यह कहानी बर्बरीक की है, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘खाटू श्याम’ के नाम से जानती है। जब भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि बर्बरीक के पास बहुत ज्यादा शक्ति है, तो उन्होंने दान में उनका सिर मांग लिया। बर्बरीक के इस बड़े बलिदान से खुश होकर कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में लोग उन्हें कृष्ण के ही नाम ‘श्याम’ से पूजेंगे।
बर्बरीक पांडवों में भीम और हिडिंबा के पोते और घटोत्कच के बेटे थे। उन्होंने भगवान शिव को खुश करने के लिए कठिन तपस्या की थी, जिससे उन्हें तीन ऐसे जादुई बाण मिले जो अकेले ही पूरे महाभारत युद्ध को खत्म करने की ताकत रखते थे। उनकी माँ अहिलावती ने उन्हें एक अनोखा संस्कार दिया था और उनसे यह वचन लिया था कि वे युद्ध में हमेशा उसी तरफ से लड़ेंगे जो पक्ष हार रहा होगा।
श्री कृष्ण को पता था कि अगर बर्बरीक युद्ध के मैदान में उतर गए, तो यह युद्ध कभी खत्म नहीं होगा। इसकी वजह उनका वह वचन था, जिसके तहत वे हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देते, जिससे युद्ध का पलड़ा बार-बार बदलता रहता। इसलिए, कृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धरकर बर्बरीक की परीक्षा ली और उनसे दान में उनका सिर (शीश) मांग लिया। बर्बरीक ने बिना किसी हिचकिचाहट के हँसते-हँसते अपना शीश काटकर कृष्ण के चरणों में रख दिया। हालांकि, उन्होंने एक अंतिम इच्छा जताई कि वे पूरा महाभारत युद्ध अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। उनकी यह इच्छा पूरी करने के लिए कृष्ण ने उनके शीश को एक ऊँची पहाड़ी पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने पूरे युद्ध को शुरू से अंत तक देखा।
कलयुग के समय में राजस्थान के खाटू गाँव में एक चमत्कारिक घटना हुई, जहाँ एक गाय रोज़ एक खास जगह पर जाकर अपना दूध गिरा देती थी। जब लोगों ने उत्सुकता में उस जगह की खुदाई की, तो वहाँ बर्बरीक का वही पवित्र शीश प्रकट हुआ। इसके बाद राजा रूप सिंह चौहान ने वहाँ एक भव्य मंदिर बनवाया और तभी से उन्हें ‘खाटू श्याम’ के नाम से पूजा जाने लगा। आज दुनिया उन्हें ‘हारे का सहारा’ के नाम से पुकारती है, क्योंकि वे उन भक्तों की आखिरी उम्मीद बनते हैं जो अपनी ज़िंदगी की हर लड़ाई हार चुके होते हैं।
खाटू श्याम जी की यह कथा हमें त्याग और समर्पण का सबसे बड़ा सबक सिखाती है। बर्बरीक एक ऐसे योद्धा थे जिनके पास युद्ध जीतने की पूरी शक्ति थी, लेकिन धर्म को बचाने के लिए उन्होंने खुद को हारना और बलिदान देना स्वीकार किया। आज फाल्गुन के मेले में जो लाखों लोग आते हैं, वे सिर्फ दर्शन के लिए नहीं बल्कि उस अटूट विश्वास के साथ आते हैं कि जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब ‘श्याम बाबा’ उनका हाथ थाम लेते हैं। आस्था की यह अनोखी यात्रा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही मजबूत है।
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