नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के दावे पर सवाल, राष्ट्रीय सैनिक संस्था ने रखे ऐतिहासिक साक्ष्य

टेन न्यूज नेटवर्क

Ghaziabad News (30/12/2025): नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय सैनिक संस्था ने सार्वजनिक मंच पर उठाया है। संस्था के मुख्यालय, 133-बी मॉडल टाउन ईस्ट, गाजियाबाद में मंगलवार को आयोजित एक ऑनलाइन बैठक में यह स्पष्ट दावा किया गया कि नेताजी की 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई थी।

बैठक का आयोजन एक ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा था। संस्था के पदाधिकारियों ने बताया कि 30 दिसंबर वह दिन है, जब नेताजी ने अंडमान-निकोबार के रोज आइलैंड पर ब्रिटिश यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया था। इसी अवसर पर नेताजी के जीवन और कथित मृत्यु से जुड़े तथ्यों पर विस्तार से चर्चा की गई।

संस्था के प्रतिनिधियों ने कहा कि शाहनवाज खान आयोग और खोसला आयोग ने विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की बात को स्वीकार किया था, लेकिन वर्ष 2005 में गठित मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत में ही स्पष्ट किया था कि नेताजी की मृत्यु प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी। आयोग ने यह भी उल्लेख किया था कि उस समय नेताजी जीवित नहीं थे, लेकिन उनकी मृत्यु के कारणों को लेकर ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

बैठक में कई ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों का उल्लेख किया गया। बताया गया कि 30 सितंबर 1945 को जापान से जनरल मैकआर्थर ने तार के माध्यम से लॉर्ड माउंटबेटन को सूचना दी थी कि सुभाष बोस एक बार फिर बच निकले हैं। इसी तरह महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय द्वारा नेताजी के परिवार को श्राद्ध न करने की सलाह देने का भी हवाला दिया गया।

प्रतिनिधियों के अनुसार दिसंबर 1945 से फरवरी 1946 के बीच नेताजी के रेडियो प्रसारण सुने जाने के प्रमाण मौजूद हैं। इसके अलावा 24 अक्टूबर 1947 को आयोजित एशियाई जनरलों के सम्मेलन में दूसरी पंक्ति में सुभाष चंद्र बोस के बैठे दिखाई देने का दावा भी किया गया। वर्ष 1958 में रूस यात्रा से लौटने के बाद विजयलक्ष्मी पंडित द्वारा नेताजी के जीवित होने की बात कहने और 16 मई 1962 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस को लिखे पत्र का भी उल्लेख किया गया, जिसमें मृत्यु का कोई ठोस प्रमाण न होने की बात कही गई थी।

संस्था ने लॉर्ड माउंटबेटन के सचिव एल. भोसले की पुस्तक का हवाला देते हुए दावा किया कि समझौते की शर्तों में यह लिखा था कि सुभाष चंद्र बोस को भारत आने की अनुमति नहीं दी जाएगी और यदि वे आए तो उन्हें ब्रिटेन को सौंप दिया जाएगा।

बैठक में श्यामलाल जैन के बयान का भी उल्लेख किया गया, जो कभी जवाहरलाल नेहरू के टाइपिस्ट थे। उन्होंने सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए अपने लिखित बयान में कहा था कि उन्होंने नेहरू जी के निर्देश पर एक पत्र टाइप किया था, जिसमें उल्लेख था कि 23 अगस्त 1945 को नेताजी मंचूरिया के डायरेन हवाई अड्डे पर उतरे और बाद में कुछ लोगों के साथ रूस की सीमा की ओर रवाना हो गए थे।

राष्ट्रीय सैनिक संस्था ने जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी गई अस्थियों को नेताजी की अस्थियां मानने से भी इनकार किया। संस्था के सदस्यों का कहना है कि यदि उन अस्थियों को भारत लाकर संगम में प्रवाहित करने की बात की जाती है, तो उससे पहले विभिन्न देशों में उनका डीएनए परीक्षण कराया जाना चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

बैठक में शामिल कर्नल तेजेंद्र पाल त्यागी, कर्नल मुकेश त्यागी, गौरव सेनानी राजेंद्र बगासी, ज्ञान सिंह, चंदन सिंह, गणेश दत्त, अंजू शर्मा, सीमा त्यागी, उर्वशी वालिया, पुष्कर त्यागी बिष्ट, नमिता भल्ला, भारती, संध्या त्यागी, धीरेन्द्र त्रिपाठी, वेद प्रकाश शर्मा, विशाल मेहता, गोपाल सिंह अधिकारी, रमाकांत कुशवाह, धर्मेंद्र कुमार दास, मोनिका और स्वाति बंसल सहित कई देशभक्त नागरिकों ने एक स्वर में मांग की कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु से जुड़े तथ्यों पर किसी भी तरह का पर्दा न डाला जाए।

सभी प्रतिभागियों ने यह भी मांग रखी कि नेताजी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न और सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र एक साथ प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्र उनके अद्वितीय योगदान को उचित सम्मान दे सके।


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