मासिक धर्म स्वास्थ्य पर बोले राघव चड्ढा- यह महिलाओं का नहीं बल्कि पब्लिक हेल्थ का मुद्दा
टेन न्यूज नेटवर्क
New Delhi News (14/03/2026): राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के मुद्दे को उठाते हुए इसे देश की आधी आबादी से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया। उन्होंने कहा कि वह आज एक सांसद के रूप में नहीं, बल्कि भारत की महिलाओं के प्रतिनिधि के तौर पर इस विषय पर बात करना चाहते हैं।
राघव चड्ढा ने कहा कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन समाज में इसे सामाजिक वर्जना बना दिया गया है। लोग इस विषय के बारे में जानते तो हैं, लेकिन इस पर खुलकर बात करने से कतराते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 35 करोड़ महिलाएं मासिक धर्म चक्र से गुजरती हैं, जबकि हर साल करीब 12 करोड़ किशोरियां मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता की चुनौतियों का सामना करती हैं। खराब सुविधाओं और संसाधनों की कमी के कारण हर साल लगभग 2.3 करोड़ लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। इसके अलावा स्वच्छता और आवश्यक उत्पादों की कमी के कारण बेटियां साल में औसतन 60 दिन स्कूल नहीं जा पातीं, वहीं कई कामकाजी महिलाएं महीने में 2 से 5 दिन तक कार्यस्थल नहीं जा पातीं।
राघव चड्ढा ने कहा कि देश में शराब और सिगरेट खुलेआम बिकते हैं, लेकिन सेनेटरी पैड अक्सर अखबार में लपेटकर दिए जाते हैं, जैसे वह कोई अवैध वस्तु हो।
उन्होंने कहा कि यह केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है। उनके अनुसार लगभग 91 प्रतिशत महिलाएं मासिक धर्म से जुड़ी किसी न किसी स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित होती हैं, लेकिन सामाजिक झिझक के कारण कई महिलाएं डॉक्टर के पास नहीं जाती। इससे सर्वाइकल कैंसर और यूटीआई जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
शिक्षा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि स्कूलों में केवल शौचालय बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें उपयोग के योग्य बनाना भी जरूरी है। पानी, साबुन और सेनेटरी पैड जैसी सुविधाओं के बिना शौचालय केवल एक कमरा बनकर रह जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान ‘अशुद्ध’ कहकर रसोई या सामाजिक गतिविधियों से दूर रखा जाता है। इसके अलावा देश में लगभग 33 प्रतिशत महिलाओं को अपने पहले पीरियड से पहले इसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती।
किफायती उत्पादों की बात करते हुए राघव चड्ढा ने कहा कि सेनेटरी पैड कोई विलासिता नहीं बल्कि आवश्यक वस्तु है। उन्होंने बताया कि सरकार ने सेनेटरी पैड पर जीएसटी हटा दिया है, लेकिन इन्हें बनाने वाले कच्चे माल पर अभी भी जीएसटी लगता है। भारत में पीरियड से जुड़े उत्पादों पर हर महीने लगभग 300 से 500 रुपये तक का खर्च आता है, जो कई गरीब परिवारों के लिए बड़ा बोझ है।
उन्होंने कहा कि स्पेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में मासिक धर्म के दौरान पेड लीव की व्यवस्था है, जबकि भारत में इस विषय पर खुलकर चर्चा भी नहीं होती।
इस दौरान राघव चड्ढा ने कई सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि हर स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल पर मुफ्त सेनेटरी पैड और उपयोग योग्य शौचालय की व्यवस्था होनी चाहिए। आंगनबाड़ी और आशा नेटवर्क के माध्यम से घर-घर तक सस्ते या मुफ्त उत्पाद उपलब्ध कराए जाएं। इसके अलावा पीरियड प्रोडक्ट्स बनाने वाले कच्चे माल से जीएसटी हटाने, लड़कों को भी मासिक धर्म के बारे में शिक्षा देने, कचरा प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय ढांचा तैयार करने और जिला स्तर पर सुविधाओं की वार्षिक मॉनिटरिंग करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
अपने संबोधन के अंत में राघव चड्ढा ने कहा कि यदि किसी लड़की को स्कूल इसलिए नहीं जाना पड़ता क्योंकि वहां पानी या सेनेटरी पैड की सुविधा नहीं है, तो यह उसकी नहीं बल्कि समाज और नीतियों की विफलता है। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता कोई एहसान नहीं, बल्कि महिलाओं का अधिकार है।
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