अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान, CJI की अगुवाई में सोमवार को सुनवाई

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (28 December 2025): अरावली हिल्स और अरावली रेंज से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ सोमवार को इस अहम मामले की सुनवाई करेगी। इस बेंच में जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस ए. जी. मसीह भी शामिल हैं। मामला ‘इन री: डेफिनिशन ऑफ अरावली हिल्स एंड रेंजेस एंड एंसिलरी इश्यूज’ के तहत दर्ज किया गया है, जिसमें अरावली की नई परिभाषा और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार होगा।

अरावली रेंज का भौगोलिक और पर्यावरणीय महत्व

अरावली रेंज चार राज्यों दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली हुई है और इसे धरती की सबसे पुरानी जियोलॉजिकल संरचनाओं में से एक माना जाता है। यह भारत के सबसे पुराने फोल्ड पहाड़ों में शामिल है। अरावली उत्तर भारत के जलवायु संतुलन, भूजल रिचार्ज और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, साथ ही यह कई वन्य जीवों और दुर्लभ वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास भी है।

केंद्र सरकार की नई परिभाषा बनी विवाद की वजह

हाल ही में केंद्र सरकार ने अरावली हिल्स की नई परिभाषा को लेकर बड़ा फैसला लिया था। नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर के एक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके तहत अरावली हिल्स को फिर से परिभाषित किया गया। इस नई परिभाषा के अनुसार, आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचे लैंडफॉर्म को ही अरावली हिल्स माना जाएगा।

नई परिभाषा के तकनीकी मानदंड

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि यदि दो या उससे अधिक पहाड़ियाँ एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हैं, तो उन्हें अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा। यह परिभाषा केंद्र सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर तय की गई है। सरकार का तर्क है कि इससे अरावली क्षेत्र की पहचान में स्पष्टता आएगी और प्रशासनिक निर्णयों में एकरूपता बनेगी।

विपक्ष और पर्यावरणविदों की चिंता

नई परिभाषा के बाद देशभर में राजनीतिक और पर्यावरणीय विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष का दावा है कि इससे दिल्ली से गुजरात तक करीब 650 किलोमीटर लंबी अरावली रेंज का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली अधिकांश पहाड़ियां सुरक्षित क्षेत्र से हट जाएंगी, जिससे माइनिंग, निर्माण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

सरकार का स्पष्टीकरण और सुप्रीम कोर्ट पर नजरें

विवाद के बीच पर्यावरणविदों ने ‘सेव अरावली’ अभियान शुरू किया है। वहीं, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस सप्ताह की शुरुआत में स्पष्ट किया कि उसने राज्यों को अरावली क्षेत्र में किसी भी नई माइनिंग लीज देने पर पूरी तरह रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं। अब सोमवार को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे की दिशा तय होने की उम्मीद है।।


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