“अरावली के अस्तित्व पर संकट या केवल अफ़वाह?, क्या है पूरे मामले की सच्चाई” | खान सर | राकेश यादव सर
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (24/12/2025): अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर हाल के दिनों में देशभर में तीखी बहस छिड़ गई है। 800 किलोमीटर लंबी, दुनिया की सबसे प्राचीन पहाड़ियों में गिनी जाने वाली अरावली को “काटे जाने” के दावे, शेड्यूल-6 की मांग, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश इन सबको लेकर सोशल मीडिया से टीवी डिबेट तक विरोधाभासी बातें सामने आईं। एक तरफ इसे पर्यावरण विनाश की साजिश बताया गया, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अवैध खनन रोकने और अरावली बचाने की ऐतिहासिक पहल कहा गया। असलियत क्या है, यह समझना जरूरी है।
अरावली को लेकर पहला बड़ा दावा यह किया गया कि सांसदों और नीतिगत व्याख्याओं के आधार पर 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए खोल दिया जाएगा। यह भी कहा गया कि अरावली की करीब 93 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची हैं, इसलिए व्यावहारिक रूप से पूरी अरावली को काटने का रास्ता साफ हो जाएगा। इसे शेड्यूल-6 से जोड़ा गया और तर्क दिया गया कि चूंकि अरावली क्षेत्र शेड्यूल-6 के तहत नहीं आता, इसलिए यहां स्थानीय लोगों की सहमति के बिना भी बड़ी कंपनियां खनन कर सकेंगी। इसी संदर्भ में यह चेतावनी दी गई कि अरावली के नष्ट होने से उड़ने वाली रेत दिल्ली-एनसीआर से लेकर हिमालय तक असर डालेगी, ग्लेशियरों पर धूल की परत जमेगी, बर्फ तेजी से पिघलेगी और आगे चलकर गंगा-यमुना बेसिन में बाढ़ जैसे खतरे बढ़ेंगे।
इसी बहस में प्रसिद्ध शिक्षक खान सर ने अपने क्लास में शेड्यूल-6 का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि संविधान में शेड्यूल-6 को असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे क्षेत्रों में इसलिए लागू किया गया ताकि वहां के जंगल, जमीन, खनिज और स्थानीय समुदाय बड़ी कंपनियों के शोषण से सुरक्षित रह सकें। उनका तर्क था कि लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी शेड्यूल-6 जैसी संवैधानिक सुरक्षा जरूरी है, क्योंकि अंधाधुंध खनन, फैक्ट्रियां और होटल वहां के पर्यावरण और स्थानीय लोगों को बर्बाद कर सकते हैं। इस संदर्भ में सोनम वांगचुक के चार साल पुराने शेड्यूल-6 आंदोलन, उनके खिलाफ कार्रवाई और विरोध प्रदर्शनों पर एनएसए लगाए जाने का भी जिक्र किया गया, जिसे लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के उदाहरण के रूप में पेश किया गया।
दूसरी तरफ अरावली प्रोटेस्ट पर प्रसिद्ध शिक्षक राकेश यादव सर के अनुसार, यह नैरेटिव कि सुप्रीम कोर्ट अरावली को खत्म करना चाहता है, पूरी तरह भ्रामक है। आंकड़ों के मुताबिक 1975 से 2019 के बीच करीब 8 प्रतिशत अरावली पहले ही खत्म हो चुकी थी, जिसका मुख्य कारण अवैध खनन था। यदि यही स्थिति बनी रहती, तो 2059 तक करीब 22 प्रतिशत अरावली रेंज पूरी तरह नष्ट हो सकती थी। इसी गंभीर खतरे को देखते हुए 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पिछले 50–60 वर्षों में लगभग एक चौथाई अरावली पहले ही नष्ट हो चुकी है।
शिक्षक राकेश यादव के मुताबिक, 100 मीटर ऊंचाई वाली परिभाषा को गलत तरीके से पेश किया गया। राजस्थान सरकार की 2002 की स्टडी, जिसे 2006 में लागू किया गया था, उसमें 100 मीटर की सीमा सिर्फ जियो-मॉर्फोलॉजिकल क्लासिफिकेशन के लिए थी, न कि संरक्षण खत्म करने या खनन खोलने के लिए। वास्तविकता यह है कि अरावली क्षेत्र पहले भी संरक्षण के दायरे में था और आज भी है। सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी हिस्से को मनमाने ढंग से खनन के लिए खोलने के बजाय, पूरे अरावली क्षेत्र गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक के लिए एक समान और वैज्ञानिक फ्रेमवर्क बनाने का फैसला किया।
इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने एक तकनीकी टीम गठित करने का आदेश दिया है, जो पूरी अरावली रेंज का अध्ययन करेगी और उसके बाद ही तय होगा कि कहां खनन संभव है और कहां पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। तब तक के लिए सभी प्रकार की माइनिंग पर सख्त रोक लगा दी गई है। यहां तक कि 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के इलाके को भी “नो-माइनिंग ज़ोन” घोषित किया गया है। यह फैसला सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के लिए ही नहीं, बल्कि उन ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए भी अहम बताया गया है, जिन्होंने अवैध खनन के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान गंवाई।
बीते वर्षों में अवैध खनन से जुड़ी हिंसक घटनाएं इस खतरे की गंभीरता को दिखाती हैं। 2015 में हथियारबंद लोगों ने जांच कर रहे अधिकारियों पर हमला किया, 2022 में हरियाणा में डीएसपी सुरेंद्र सिंह को अवैध खनन से जुड़े ट्रक ने कुचल दिया, और 2024-25 में विस्फोटों से स्थानीय लोग घायल हुए तथा घर क्षतिग्रस्त हुए। इन्हीं हालात को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट, मजबूत और वैज्ञानिक परिभाषा की जरूरत बताई ताकि अरावली को हर राज्य में समान रूप से बचाया जा सके।
अरावली को लेकर फैली अफवाहों और भावनात्मक दावों के बीच तथ्य समझना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अरावली को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि उसे अवैध खनन से बचाने और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की कोशिश के तौर पर सामने आया है। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि टीवी, सोशल मीडिया या किसी एक बयान पर भरोसा करने से पहले रिपोर्ट, फैसले और तथ्यों को समझना जरूरी है—क्योंकि अरावली सिर्फ एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि पूरे भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ है।
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