भारत में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर हुई 103, 2014 के मुकाबले लगभग चार गुना विस्तार
टेन न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi News (25 October 2026): भारत में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों यानी रामसर स्थलों का नेटवर्क तेजी से बढ़ा है। केंद्र सरकार की ओर से 25 अक्टूबर 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2014 में भारत में 26 रामसर स्थल थे, जिनकी संख्या बढ़कर अब 103 हो गई है। ये स्थल 13.87 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं। स्थलों की संख्या के लिहाज से भारत एशिया में पहले और दुनिया में तीसरे स्थान पर है। रामसर स्थल जैव विविधता के संरक्षण, बाढ़ के प्रभाव को कम करने, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय लोगों की आजीविका बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन आर्द्रभूमियों में झीलें, दलदली क्षेत्र, मैंग्रोव वन, नदी के बाढ़ क्षेत्र और अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं, जो अनेक वन्यजीवों और प्रवासी पक्षियों को आश्रय प्रदान करते हैं।
रामसर कन्वेंशन क्या है और भारत कब बना इसका हिस्सा?
रामसर कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग से जुड़ी एक अंतर-सरकारी संधि है। इसे 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में स्वीकार किया गया था और वर्ष 1975 में यह लागू हुई। भारत 1 फरवरी 1982 को इस कन्वेंशन का पक्षकार बना। अक्टूबर 2026 तक इस संधि में 172 देश शामिल हैं और दुनिया भर में 2,536 से अधिक स्थलों को रामसर स्थल के रूप में नामित किया जा चुका है। कन्वेंशन के तहत आर्द्रभूमियों का संरक्षण, उनका संतुलित उपयोग और उनके प्रबंधन को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाता है। भारत में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण योजना (NPCA), अमृत धरोहर, मिष्टी और मिशन सहभागिता जैसी पहलों के माध्यम से वैज्ञानिक तरीकों और जनभागीदारी के आधार पर संरक्षण को बढ़ावा दे रही है।
किसी आर्द्रभूमि को रामसर स्थल का दर्जा कैसे मिलता है?
किसी आर्द्रभूमि को रामसर सूची में शामिल करने के लिए निर्धारित नौ मानदंडों में से कम से कम एक को पूरा करना जरूरी है। इनमें दुर्लभ या विशिष्ट आर्द्रभूमि का अस्तित्व, संकटग्रस्त प्रजातियों को आश्रय, जैव विविधता का संरक्षण और प्रवासी पक्षियों तथा मछलियों के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराना शामिल है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई आर्द्रभूमि नियमित रूप से कम से कम 20 हजार जलपक्षियों को आश्रय देती है या किसी जलपक्षी प्रजाति की वैश्विक आबादी के एक प्रतिशत को सहारा देती है, तो वह निर्धारित मानदंडों के तहत पात्र हो सकती है। भारत में इस प्रक्रिया की शुरुआत राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा उपयुक्त आर्द्रभूमि की पहचान से होती है। इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय नामांकन की प्रक्रिया का समन्वय करता है और प्रस्ताव रामसर सचिवालय को भेजा जाता है। नामांकन के बाद भी स्थल की पारिस्थितिक विशेषताओं की निगरानी और संरक्षण जरूरी रहता है।
तमिलनाडु सबसे आगे, उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु 20 रामसर स्थलों के साथ देश में पहले स्थान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश 14 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है। भारत में रामसर स्थलों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 में 11 आर्द्रभूमियों को इस सूची में शामिल किया गया, जिससे इनकी कुल संख्या 96 तक पहुंच गई। इसके बाद जून 2026 में उत्तर प्रदेश के सुरहा ताल को भारत का 100वां रामसर स्थल घोषित किया गया और अगस्त में अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील 101वें स्थल के रूप में सूची में शामिल हुई। इसके बाद चंडीगढ़ की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील को भी सूची में जगह मिली। इस विस्तार से देश की विविध आर्द्रभूमियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है और उनके संरक्षण के लिए सहयोग के नए अवसर सामने आए हैं।
सुखना आर्द्रभूमि और सौज झील का क्या है महत्व?
हाल ही में शामिल किए गए स्थलों में चंडीगढ़ की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील विशेष महत्व रखती हैं। सुखना आर्द्रभूमि शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित मानव निर्मित जलाशय है, जिसका निर्माण वर्ष 1958 में किया गया था। यह प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास है। यहां पलास फिश ईगल, कॉमन पोचार्ड और ब्लैक पोंड टर्टल जैसी प्रजातियों का उल्लेख किया गया है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में स्थित सौज झील एक उथली बाढ़भूमि आर्द्रभूमि है, जहां 30 हजार से अधिक जलीय पक्षियों के नियमित रूप से आने की जानकारी दी गई है। यह सारस और वृहद चित्तीदार चील जैसी पक्षी प्रजातियों को भोजन और प्रजनन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करती है। इन दोनों स्थलों को रामसर सूची में शामिल करने से इनके पारिस्थितिक महत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
सुंदरबन भारत का सबसे बड़ा रामसर स्थल, चिल्का और केवलादेव का भी ऐतिहासिक महत्व
पश्चिम बंगाल का सुंदरबन आर्द्रभूमि क्षेत्र 4,23,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल के साथ भारत का सबसे बड़ा रामसर स्थल है। इसे 30 जनवरी 2019 को इस सूची में शामिल किया गया था। सुंदरबन अपने विशाल मैंग्रोव वनों और रॉयल बंगाल टाइगर सहित समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। वहीं, ओडिशा की चिल्का झील और राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को 1 अक्टूबर 1981 को भारत के पहले रामसर स्थलों के रूप में नामित किया गया था। चिल्का झील खारे पानी की प्रमुख लैगून है, जहां इरावदी डॉल्फिन, मछलियों और अनेक जलपक्षियों का आवास है। सफल पारिस्थितिक सुधार के बाद वर्ष 2002 में चिल्का झील को मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड से हटा दिया गया था। यह रिकॉर्ड उन रामसर स्थलों का विवरण रखता है, जहां पारिस्थितिक विशेषताओं में गंभीर बदलाव हो चुका हो या होने का खतरा हो।
आर्द्रभूमियों का संरक्षण क्यों जरूरी है?
रामसर स्थलों का महत्व केवल वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण तक सीमित नहीं है। ये जल भंडारण, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, मत्स्य पालन और कृषि जैसी गतिविधियों में भी योगदान देते हैं। आर्द्रभूमियां स्थानीय समुदायों की आजीविका को सहारा देने के साथ जलवायु और पर्यावरण के संतुलन में मदद करती हैं। रामसर सूची में शामिल होने से स्थलों को अंतरराष्ट्रीय पहचान, वैज्ञानिक मार्गदर्शन, विशेषज्ञ सहायता और संरक्षण परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग के अवसर मिलते हैं। भारत में आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत इनके संरक्षण और प्रबंधन पर जोर दिया गया है। सरकार के सामने अब चुनौती इन स्थलों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनके प्राकृतिक स्वरूप, जल गुणवत्ता और जैव विविधता को सुरक्षित रखने की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों को संरक्षित किया जा सके।
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