New Delhi News (15 September 2025): दिल्ली को देशभर के युवाओं के सपनों का शहर कहा जाता है। हर साल हजारों अभ्यर्थी IAS और IPS बनने का सपना लेकर राजधानी पहुंचते हैं, लेकिन हर किसी की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। बिहार के दरभंगा से दिल्ली आए मोहम्मद मिनाज की कहानी इसी संघर्ष की तस्वीर सामने रखती है। करीब डेढ़ साल से दिल्ली में रहकर UPSC की तैयारी कर रहे मिनाज के पास न अपना कमरा है और न ही किराए का कोई ठिकाना। उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा एक 24 घंटे खुली रहने वाली लाइब्रेरी में बीतता है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ वे कुर्सी पर पैर रखकर सो भी जाते हैं।
मिनाज के लिए लाइब्रेरी ही उनका कमरा और पढ़ाई की जगह दोनों है। उनके कपड़े और जरूरी सामान भी लाइब्रेरी के लॉकर में रखे रहते हैं। नहाने के लिए उन्हें करीब 10 किलोमीटर दूर मजनू का टीला जाना पड़ता है। वहां स्थित गुरुद्वारे में उन्हें खाना मिल जाता है और भोजन करने के बाद वे दोबारा लाइब्रेरी लौटकर अपनी पढ़ाई शुरू कर देते हैं। गुरुद्वारे तक आने-जाने के लिए उन्हें ऑटो का सहारा लेना पड़ता है, जिसमें करीब 20 रुपये खर्च होते हैं। समय और पैसे की बचत के लिए वे कई बार दिन में सिर्फ एक बार ही खाना खाते हैं।
इतने कठिन हालात के बावजूद मिनाज ने UPSC की तैयारी छोड़ने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा है। उनके मुताबिक लाइब्रेरी की फीस और दूसरे जरूरी खर्चों को मिलाकर उनका मासिक खर्च करीब 3 हजार रुपये है। इस खर्च को पूरा करने के लिए वे GroMo App के जरिए ऑनलाइन बैंक अकाउंट खुलवाने जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं और हर महीने कुछ हजार रुपये जुटा लेते हैं। यानी एक तरफ UPSC जैसी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक की तैयारी, तो दूसरी तरफ रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की जद्दोजहद—मिनाज दोनों मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं।
मिनाज का सपना सिर्फ सरकारी नौकरी हासिल करना नहीं है। वे कहते हैं कि वे ऐसे लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना चाहते हैं, जिन्हें इन योजनाओं की सही जानकारी नहीं मिल पाती। उनके आदर्श स्वामी विवेकानंद हैं और उनके विचारों ने मिनाज को मुश्किल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। मिनाज का कहना है कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद की किताबें पढ़ी हैं और उनके उस विचार को अपनी जिंदगी का आधार बनाया है कि एक विचार को पकड़कर उसी में डूब जाना चाहिए। उनका कहना है कि सफलता मिलेगी या नहीं, यह उनके हाथ में नहीं है, लेकिन मेहनत करना उनके हाथ में जरूर है।
मिनाज के परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद चुनौतीपूर्ण है। उनके माता-पिता की उम्र 70 साल से अधिक है और उनके पिता बीमार रहते हैं। परिवार की जिम्मेदारी उनके बड़े भाई संभालते हैं, जबकि उनकी बहन अपनी पढ़ाई के साथ बच्चों को कोचिंग पढ़ाकर आर्थिक मदद करती हैं। बहनों की शादी के कारण परिवार पर कर्ज भी है। इन परिस्थितियों के बावजूद मिनाज ने अपने माता-पिता को दिल्ली में अपनी मुश्किलों के बारे में नहीं बताया, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनके बूढ़े माता-पिता उनकी चिंता में और परेशान हों।
मोहम्मद मिनाज की कहानी सिर्फ एक UPSC अभ्यर्थी के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस जिद और उम्मीद की कहानी है, जिसके सहारे कई युवा सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। लाइब्रेरी की कुर्सी को बिस्तर बनाकर सोने से लेकर 10 किलोमीटर दूर जाकर भोजन और स्नान करने तक, मिनाज की रोजमर्रा की जिंदगी बेहद कठिन है, लेकिन उनका लक्ष्य अब भी वही है। अपनी बात के अंत में वे स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध संदेश को दोहराते हैं “उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।” यही संदेश फिलहाल मिनाज के संघर्ष और उनके UPSC के सफर का सबसे बड़ा संबल बना हुआ है।
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