Zee के सुभाष चंद्रा पर ₹22 हजार करोड़ की देनदारी, सिर्फ ₹6.5 करोड़ के सेटलमेंट पर सवाल
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (05/09/2026): सुभाष चंद्रा के कर्ज और उनकी कंपनियों से जुड़े वित्तीय मामलों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज है। रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रा पर कंपनियों के कर्ज की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ी करीब ₹22,600 करोड़ की देनदारी का मामला सामने आया है। वहीं, चंद्रा का दावा है कि यह आंकड़ा वास्तविक बकाया राशि को नहीं दर्शाता और उनके अनुसार वास्तविक देनदारी काफी कम है। उन्होंने यह भी कहा है कि बीते वर्षों में वह बड़ी रकम चुका चुके हैं और बाकी देनदारियों के मुकाबले संपत्तियां मौजूद हैं।
कभी कारोबार की दुनिया में तेजी से विस्तार करने वाले सुभाष चंद्रा ने अनाज कारोबार से शुरुआत कर पैकेजिंग, मनोरंजन, टेलीविजन और डीटीएच जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में अपना कारोबार खड़ा किया। Zee के विस्तार और निजी टेलीविजन के शुरुआती दौर में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। हालांकि, बाद में इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्तार और कर्ज आधारित निवेश उनके लिए मुश्किल साबित हुआ। लंबे समय में पैसा लौटाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के मुकाबले तत्काल कर्ज और ब्याज की जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं, जिससे नकदी प्रवाह पर दबाव पड़ा।
इस संकट को IL&FS के डिफॉल्ट के बाद और बढ़ा माना गया। इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को मिलने वाले कर्ज के रोलओवर और अतिरिक्त समय की व्यवस्था पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने सख्ती शुरू कर दी। इसी दौरान Zee और Dish TV जैसी कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट आई, जबकि चंद्रा ने पहले इन शेयरों को गिरवी रखकर कर्ज जुटाया था। शेयर मूल्य गिरने के बाद कर्जदाताओं का दबाव बढ़ा और चंद्रा को अपनी हिस्सेदारी बेचकर कर्ज चुकाने की कोशिश करनी पड़ी। 2019 में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर सफाई देते हुए कर्ज चुकाने का भरोसा भी जताया था।
अब मौजूदा विवाद का केंद्र उनकी व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा समाधान प्रस्ताव है। मामले में करीब ₹22,600 करोड़ की गारंटी के मुकाबले केवल ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाले प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर कुछ बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, मतदान में करीब 80 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि LIC, HDFC, Axis Bank और Canara Bank समेत कुछ संस्थानों ने प्रस्ताव का विरोध किया। विरोध करने वालों ने कम भुगतान और कथित संबंधित पक्षों की वोटिंग भूमिका पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, चंद्रा का कहना है कि उन पर लगाए जा रहे आंकड़े और आरोप वास्तविक स्थिति को सही तरीके से पेश नहीं करते। अब इस मामले में आगे होने वाली कानूनी और वित्तीय कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि वास्तविक देनदारी कितनी है और कर्ज समाधान की प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।
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