Greater Noida News (14/08/2026): आईटीएस इंजीनियरिंग कॉलेज, ग्रेटर नोएडा में शोध, नवाचार और तकनीकी परियोजनाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुक्रवार को “Sponsored & Seed Grant Proposal Writing for Translational Research” विषय पर विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। संस्थान के नायडू हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन Institution’s Innovation Council (IIC) के तत्वावधान में किया गया। कार्यशाला में संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों को शोध परियोजनाओं के लिए प्रभावी ग्रांट प्रस्ताव तैयार करने के साथ-साथ शोध को व्यावहारिक उपयोग तक पहुंचाने की प्रक्रिया से अवगत कराया गया।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को यह समझाना था कि किसी शोध विचार को केवल अकादमिक अध्ययन तक सीमित रखने के बजाय उसे ऐसी परियोजना में किस प्रकार विकसित किया जाए, जिसे सामाजिक जरूरतों, औद्योगिक मांग और बाजार की संभावनाओं से जोड़ा जा सके। विशेषज्ञों ने प्रस्ताव लेखन के विभिन्न चरणों पर विस्तार से चर्चा करते हुए फंडिंग एजेंसियों के समक्ष शोध की उपयोगिता और संभावित प्रभाव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के तरीके बताए।
कार्यक्रम में AIC IIT दिल्ली के मैनेजर-इन्क्यूबेशन डॉ. हिमांशु अग्रवाल ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में प्रतिभागियों को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी सफल ग्रांट प्रस्ताव की नींव एक स्पष्ट और प्रासंगिक शोध समस्या पर आधारित होती है। इसके बाद शोध के उद्देश्य, कार्ययोजना, तकनीकी दृष्टिकोण, संभावित परिणाम और बजट को तार्किक एवं व्यावहारिक तरीके से प्रस्तुत करना आवश्यक है।
उन्होंने प्रतिभागियों का ध्यान इस बात की ओर भी आकर्षित किया कि फंडिंग प्राप्त करने के लिए केवल अच्छा शोध विचार पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रस्ताव को संबंधित फंडिंग एजेंसी की प्राथमिकताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रस्ताव में यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रस्तावित परियोजना किस समस्या का समाधान करेगी, उसका संभावित प्रभाव क्या होगा और निर्धारित संसाधनों के भीतर उसके परिणाम किस प्रकार हासिल किए जा सकते हैं।
कार्यशाला के दौरान Translational Research की अवधारणा पर विशेष जोर दिया गया। डॉ. अग्रवाल ने समझाया कि प्रयोगशाला में विकसित किसी तकनीक या शोध निष्कर्ष को वास्तविक जीवन में उपयोगी उत्पाद, तकनीक, प्रक्रिया या समाधान में बदलना ही शोध के प्रभाव को व्यापक बनाता है। उन्होंने शोधकर्ताओं को ऐसे प्रोजेक्ट विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जिनमें तकनीकी उपलब्धि के साथ-साथ समाज और उद्योग के लिए उपयोगिता की स्पष्ट संभावना हो।
सत्र में प्रतिभागियों को ग्रांट प्रस्ताव तैयार करते समय सामने आने वाली सामान्य चुनौतियों पर भी जानकारी दी गई। शोध समस्या को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने, प्रस्ताव की नवीनता प्रदर्शित करने, अपेक्षित परिणामों को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करने, बजट को उचित ठहराने और फंडिंग एजेंसी के दिशा-निर्देशों के अनुरूप दस्तावेज तैयार करने जैसे पहलुओं पर व्यावहारिक सुझाव साझा किए गए। संवादात्मक चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने अपने शोध विचारों से जुड़े प्रश्न भी विशेषज्ञ के समक्ष रखे।
कार्यक्रम का शुभारंभ आईटीएस इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक एवं IIC अध्यक्ष डॉ. मयंक गर्ग के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने संस्थान में शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए मजबूत अकादमिक वातावरण तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शोधकर्ताओं को अपने विचारों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध अनुसंधान फंडिंग के अवसरों तक पहुंच बनाने में मददगार साबित होते हैं।
कार्यशाला के समापन अवसर पर IIC के संयोजक डॉ. राजीव रंजन ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने विशेषज्ञ वक्ता, प्रतिभागियों और आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रम संस्थान में शोध संस्कृति को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यशाला में आईटीएस इंजीनियरिंग कॉलेज के बी.टेक और एमबीए पाठ्यक्रमों से जुड़े संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की। विशेषज्ञ मार्गदर्शन, प्रश्नोत्तर सत्र और व्यावहारिक चर्चाओं के माध्यम से प्रतिभागियों को प्रतिस्पर्धी शोध प्रस्ताव तैयार करने तथा बाहरी वित्तीय सहायता के अवसरों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की दिशा में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई। कार्यक्रम के माध्यम से संस्थान ने शोध को केवल प्रकाशन और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित रखने के बजाय उसे नवाचार, उद्यमिता, उद्योग सहयोग और सामाजिक उपयोगिता से जोड़ने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
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