मणिपुर में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत को नम आंखों से अंतिम विदाई

टेन न्यूज नेटवर्क

Ghaziabad News (09/07/2026): मणिपुर में उग्रवादियों के हमले में शहीद हुए असम राइफल्स के हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत को गुरुवार को गाजियाबाद के हिंडन घाट पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर जैसे ही नंदग्राम स्थित आवास पहुंचा, पूरा माहौल गमगीन हो गया। पत्नी मंजू देवी अपने पति के पार्थिव शरीर से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ीं, जबकि उनके तीनों बच्चों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इस भावुक दृश्य ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को स्तब्ध कर दिया।

अंतिम यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, जनप्रतिनिधि, सैन्य अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी शहीद को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। बारिश के बावजूद लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ा और सभी ने भारत माता के वीर सपूत को नम आंखों से अंतिम विदाई दी। हिंडन घाट पर सेना के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर शहीद को अंतिम सलामी दी, जिसके बाद पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।

डेढ़ महीने में परिवार पर टूटा दूसरा दुख

हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के डांडातोली क्षेत्र के कुकलियाल गांव के निवासी थे। वर्ष 2008 से वह गाजियाबाद के नंदग्राम स्थित उत्तरांचल नगर में अपने परिवार के साथ रह रहे थे। परिवार में पत्नी मंजू देवी, बड़ा बेटा राहुल, जो स्टेशनरी की दुकान चलाता है, तथा दो बेटियां रितिका और यशिका हैं, जो अपनी पढ़ाई कर रही हैं।

परिवार के लिए यह समय बेहद कठिन है। दरअसल, शहीद के पिता गोविंद सिंह का 3 जून को निधन हो गया था। पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर्म में शामिल होने के लिए चंद्रमोहन छुट्टी लेकर अपने पैतृक गांव पहुंचे थे। सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे करने के बाद वह 3 जुलाई को गाजियाबाद से मणिपुर के लिए रवाना हुए और 5 जुलाई को अपनी यूनिट में दोबारा ड्यूटी संभाली। लेकिन ड्यूटी जॉइन करने के अगले ही दिन वह देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। इस तरह महज डेढ़ महीने के भीतर परिवार ने पहले पिता और फिर बेटे को खो दिया।

घात लगाकर किया गया था हमला

जानकारी के अनुसार, 6 जुलाई की दोपहर मणिपुर के उखरुल जिले में 40 असम राइफल्स का काफिला नियमित ड्यूटी पूरी कर शांगशाक बटालियन मुख्यालय लौट रहा था। इसी दौरान नुंगशांग कोंग क्षेत्र के पास पहले से घात लगाए बैठे उग्रवादियों ने अत्याधुनिक हथियारों से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। हमलावरों ने आईईडी विस्फोट भी किए, जिससे पूरा इलाका दहल उठा। सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन इस हमले में हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत और वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह ने सर्वोच्च बलिदान दिया।

हमले के बाद दोनों शहीद जवानों के पार्थिव शरीर शांगशाक स्थित असम राइफल्स कैंप में रखे गए, जहां सैन्य अधिकारियों और जवानों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पोस्टमार्टम की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उनके पार्थिव शरीर परिजनों के लिए रवाना किए गए।

अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब

हिंडन घाट पर आयोजित अंतिम संस्कार में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा, भाजपा महानगर अध्यक्ष मयंक गोयल, सदर एसडीएम अरुण दीक्षित, मेरठ स्थित 56 फील्ड रेजिमेंट के कर्नल नवीन शर्मा सहित अनेक सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे। सभी ने शहीद के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और उनके सर्वोच्च बलिदान को नमन किया।

देश के लिए सर्वोच्च बलिदान

हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत का जीवन कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का प्रतीक रहा। परिवार के निजी शोक से उबरने का समय भी उन्हें नहीं मिला और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी ड्यूटी को प्राथमिकता दी। देश की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका बलिदान न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय रहेगा।


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