हमारी जरूरतें और चाहतें विषय पर चिंतनपरक डॉ. शंकर दयाल सिंह व्याख्यानमाला
डॉ.बिमलेश कुमार (सहायक प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार)
New Delhi News (8 जून 2026): भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और मानवीय संतुलन पर केंद्रित प्रतिष्ठित डॉ. शंकर दयाल सिंह व्याख्यानमाला के अंतर्गत रविवार को नई दिल्ली स्थित एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में ‘हमारी जरूरतें और चाहतें’ विषय पर एक भव्य एवं चिंतनपरक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। देशभर से आए विद्वानों, साहित्यकारों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की उपस्थिति से सभागार खचाखच भरा रहा।
कार्यक्रम में जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिदानंद सरस्वती, पूर्व सांसद गिरिजा पाण्डेय, डॉ शंकर दयाल सिंह के पुत्र राजेश कुमार सिंह. , पूर्व IAS Officer , डॉ. रश्मि सिंह भारतीय प्रशासनिक सेवा की वरिष्ठ अधिकारी, (सचिव, महिला एवं बाल विकास, दिल्ली सरकार) जो डॉ शंकर दयाल सिंह की पुत्री है। डॉ. रश्मि सिंह सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों ने सहभागिता की।
व्याख्यानमाला के दौरान वक्ताओं ने दिवंगत डॉ. शंकर दयाल सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए उन्हें भारतीय राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता का अद्वितीय संगम बताया। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में साहित्य, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी तथा अपने लेखन और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान की।
बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गांव में 27 दिसंबर 1937 को जन्मे डॉ. शंकर दयाल सिंह स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजसेवी स्वर्गीय कामता प्रसाद के पुत्र थे। राष्ट्रसेवा और सामाजिक सरोकारों की प्रेरणा उन्हें पारिवारिक संस्कारों से मिली। वे एक प्रखर साहित्यकार, चिंतक, पत्रकार और जननेता के रूप में प्रतिष्ठित रहे। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान आज भी स्मरणीय माना जाता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना के साथ हुआ। स्वागत भाषण देते हुए राजेश कुमार सिंह ने मुख्य अतिथि मनोज सिन्हा, मुख्य वक्ता स्वामी चिदानंद सरस्वती तथा अन्य गणमान्य अतिथियों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि डॉ. शंकर दयाल सिंह के विचारों और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।
जरूरत और चाहत के अंतर को समझना ही जीवन की सबसे बड़ी सीख : स्वामी चिदानंद सरस्वती
मुख्य वक्ता स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अपने प्रेरक संबोधन में भारतीय संस्कृति की विशिष्टता और जीवन दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन में अधिकांश तनाव और असंतोष का कारण जरूरतों और चाहतों के बीच की सीमाओं का धुंधला हो जाना है। उन्होंने विभिन्न शास्त्रीय संदर्भों, जीवन प्रसंगों और अपने वैश्विक अनुभवों के माध्यम से बताया कि मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित होती हैं, जबकि इच्छाओं का विस्तार अनंत है। यदि व्यक्ति संतोष, शांति और आत्मानुशासन को जीवन का आधार बना ले तो वह अधिक सार्थक और संतुलित जीवन जी सकता है।
इच्छाओं का कोई अंत नहीं, जागरूकता ही समाधान : मनोज सिन्हा
मुख्य अतिथि मनोज सिन्हा ने अपने संबोधन में डॉ. शंकर दयाल सिंह को संत-स्वभाव साहित्यकार, प्रखर चिंतक और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने लेखन में सदैव सत्य को निर्भीकता के साथ अभिव्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से आपातकाल के दौर में डॉ. सिंह की वैचारिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा का उल्लेख किया। सिन्हा ने कहा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, लेकिन जागरूकता, आत्मनियंत्रण और संतुलन व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करते हैं।

उन्होंने भारत की प्राचीन वैदिक ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विकास मॉडल के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए आध्यात्मिक मूल्यों और वैज्ञानिक सोच का संगम आवश्यक है। उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रगति तथा वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प का भी उल्लेख किया। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह, दिनेश सिंह, संतोष भारतीय, संजय पासवान, किरण चोपड़ा सहित अनेक सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हस्तियां उपस्थित रहीं। बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गांव से आए लोगों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया और मुख्य अतिथि का स्वागत किया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. रश्मि सिंह ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह व्याख्यानमाला केवल एक स्मृति कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को नैतिक मूल्यों, संतुलित जीवन और सकारात्मक चिंतन की दिशा में प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने कहा कि डॉ. शंकर दयाल सिंह व्याख्यानमाला का यह आयोजन उनके विचारों, आदर्शों और जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास साबित हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह को आत्मचिंतन, संतुलित जीवन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति नई प्रेरणा प्रदान की।।
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