New Delhi News (25 May 2026): अलका लांबा को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। महिला आरक्षण को लागू करने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले में अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया है। कोर्ट ने माना कि प्रदर्शन के दौरान सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने के आरोपों में प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। अब इस मामले में 5 जून को सजा तय करने को लेकर बहस होगी। अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
यह मामला जुलाई 2024 का है, जब संसद का मॉनसून सत्र चल रहा था। उस दौरान ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर अलका लांबा ने महिला आरक्षण और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। दिल्ली पुलिस के अनुसार उस समय इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की और बैरिकेड्स के पास पहुंचकर नारेबाजी की।
अदालत के फैसले के बाद अलका लांबा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से ही ऐसे फैसले की उम्मीद थी और वह डरने वालों में नहीं हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि वह महिलाओं की सुरक्षा और आरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर आवाज उठाती रहेंगी, चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी तरह की सजा का सामना क्यों न करना पड़े। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान दबाव में आकर पुलिस ने उनके खिलाफ एफआईआर और चार्जशीट दाखिल की थी। उनके मुताबिक महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को दबाने की कोशिश की जा रही है।
दिल्ली पुलिस ने अदालत में दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान अलका लांबा और उनके समर्थकों ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की और बैरिकेड पार करने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्ग की ओर बढ़ते हुए रास्ता बाधित किया, जिससे यातायात और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने लाउडस्पीकर के जरिए बार-बार प्रदर्शन खत्म करने की चेतावनी दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारी वहां से हटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कई लोगों को हिरासत में लिया था।
इस मामले में अलका लांबा पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 132, 221, 223 (ए) और 285 के तहत केस दर्ज किया गया था। आरोपों में सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालना, कानूनी आदेश की अवहेलना करना और सार्वजनिक रास्ता रोकना शामिल है। अदालत ने पिछली सुनवाई के दौरान कहा था कि उपलब्ध वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर उनके खिलाफ मामला बनता है। 20 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने घटना से जुड़ा वीडियो भी देखा था, जिसमें कथित तौर पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की दिखाई दी थी।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि अलका लांबा प्रदर्शनकारियों के साथ टालस्टाय मार्ग पर लगे बैरिकेड तक पहुंच गई थीं और संसद का घेराव करने की कोशिश कर रही थीं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार उन्होंने बार-बार समझाने के बावजूद प्रदर्शन समाप्त नहीं किया। पुलिस ने दावा किया कि हालात बिगड़ने की आशंका को देखते हुए कार्रवाई करनी पड़ी। बाद में सब-इंस्पेक्टर अनीता सिंह की शिकायत पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कांग्रेस इस मामले को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्षी दल कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का मुद्दा उठा रहे हैं। अब सबकी नजर 5 जून को होने वाली सुनवाई पर टिकी है, जब अदालत अलका लांबा की सजा को लेकर अंतिम फैसला सुनाएगी। यह मामला आने वाले समय में राजनीतिक और कानूनी बहस का बड़ा विषय बन सकता है।
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