दिल्ली शराब नीति केस में बड़ा फैसला: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को अलग करने से किया इनकार

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (20 April 2026): दिल्ली के चर्चित आबकारी (शराब) नीति मामले में एक अहम मोड़ तब आया जब दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सुनवाई से अलग होने की मांग की थी। सोमवार को सुनाए गए इस फैसले में जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट कहा कि वह मामले की सुनवाई जारी रखेंगी और निष्पक्षता से फैसला देंगी। अदालत का यह रुख इस हाई-प्रोफाइल केस में न्यायिक प्रक्रिया की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।

अपने फैसले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि उनके सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं, जहां उनकी निष्पक्षता और गरिमा पर सवाल उठाए गए। उन्होंने कहा कि उनके लिए आसान रास्ता यह होता कि बिना अर्जी सुने ही मामले से अलग हो जातीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अदालत ने दो टूक कहा कि वह बिना किसी दबाव के और पूरी निष्पक्षता के साथ इस मामले की सुनवाई करेंगी। यह टिप्पणी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को रेखांकित करती है।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी वादी को न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी न्यायाधीश की योग्यता या निष्पक्षता का निर्णय उच्च न्यायालय करता है, न कि कोई पक्षकार। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि कोई भी राजनेता न्यायिक आकलन करने की सीमा पार नहीं कर सकता। यह टिप्पणी सीधे तौर पर केजरीवाल की याचिका पर कड़ा संदेश मानी जा रही है।

केजरीवाल की ओर से लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि जज के परिजन किसी सरकारी पैनल में शामिल हैं, इससे किसी मामले में पक्षपात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस संबंध या हितों का टकराव साबित नहीं किया गया है। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि “वास्तविक हितों का टकराव” और “ऐसा दिखाने की कोशिश” दोनों अलग-अलग बातें हैं।

इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने अपने हलफनामे में जस्टिस शर्मा पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि जज के बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम करते हैं, जो इस मामले में सीबीआई की ओर से पेश हो रहे हैं। केजरीवाल ने यह भी आरोप लगाया कि अदालत ने शुरुआती सुनवाई में बिना उनकी दलील सुने ही सेशंस कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाए और एजेंसियों की दलीलों को प्राथमिकता दी।

केजरीवाल ने अपनी अर्जी में कहा था कि अदालत ने इस मामले में असामान्य तेजी दिखाई, जहां सामान्य मामलों में महीनों की तारीख दी जाती है, वहीं इस केस में जवाब दाखिल करने के लिए महज एक सप्ताह का समय दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिना किसी आवेदन के प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई पर रोक लगाई गई और जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई पर भी अदालत ने स्वतः हस्तक्षेप किया।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अरविन्द केजरीवाल तमिलनाडु में चुनाव प्रचार में व्यस्त बताए जा रहे हैं, जहां वह एम के स्टालिन के साथ नजर आए। वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब साफ हो गया है कि आबकारी नीति मामले की सुनवाई उसी बेंच के सामने जारी रहेगी। इस फैसले ने न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक हलकों में भी नई बहस छेड़ दी है, और आने वाले दिनों में इस केस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।


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