‘जीआई मैन’ डॉ. रजनीकांत: बनारसी साड़ी से लेकर 157 उत्पादों को दिलाई वैश्विक पहचान

टेन न्यूज नेटवर्क

National News (21/03/2026): उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के जलालपुर माफी गांव में 5 अगस्त 1960 को जन्मे डॉ. रजनीकांत आज देश में ‘जीआई मैन’ के नाम से जाने जाते हैं। उनके पिता लक्ष्मीकांत द्विवेदी, जो पेशे से शिक्षक थे, उनके जीवन के पहले प्रेरणा स्रोत रहे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने गोरखपुर से कृषि विज्ञान में स्नातक और कानपुर से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1987 में Banaras Hindu University (बीएचयू) से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की।

शैक्षणिक क्षेत्र में कार्य करने के बाद वर्ष 1993 में उन्होंने बीएचयू छोड़कर सामाजिक कार्यों की दिशा में कदम बढ़ाया। वाराणसी में ‘मानव कल्याण संघ’ के माध्यम से उन्होंने समाज सेवा की शुरुआत की। इस दौरान उन्होंने 5,760 से अधिक महिलाओं को स्थायी आजीविका से जोड़ा और हजारों बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

डॉ. रजनीकांत ने वर्ष 2007 में ‘बनारस साड़ी और ब्रोकेट’ के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग का आवेदन किया, जिसे 2009 में कानूनी मान्यता मिली। जीआई टैग किसी विशेष क्षेत्र के पारंपरिक उत्पादों को दी जाने वाली प्रमाणिक पहचान होती है, जो उसकी गुणवत्ता और उत्पत्ति की गारंटी देती है और नकली उत्पादों से सुरक्षा प्रदान करती है।

उनके प्रयासों का परिणाम यह रहा कि अब तक 157 पारंपरिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है, जबकि 186 उत्पाद अंतिम चरण में हैं। उत्तर प्रदेश वर्तमान में 79 जीआई उत्पादों के साथ देश में पहले स्थान पर है। उनके नेतृत्व में देश के विभिन्न राज्यों के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

डॉ. रजनीकांत ने स्विट्जरलैंड, जर्मनी, अबू धाबी और तुर्की सहित कई देशों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनके कार्यों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया।

डॉ. रजनीकांत के जीवन और कार्यों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री में उनके ‘जीआई मैन ऑफ इंडिया’ बनने की पूरी यात्रा को दर्शाया गया है। इसमें मिर्जापुर के एक साधारण परिवार से निकलकर सामाजिक कार्यकर्ता बनने तक का सफर, ‘मानव कल्याण संघ’ के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास और पारंपरिक भारतीय उत्पादों को Geographical Indication (जीआई) टैग दिलाने की उनकी मुहिम को विस्तार से दिखाया गया है। डॉक्यूमेंट्री में खास तौर पर बनारसी साड़ी को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया, कारीगरों की जिंदगी में आए बदलाव और भारत के स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने में उनकी भूमिका को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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