श्रीकृष्ण की 16,108 शादियों का क्या है मानवीय संदेश

टेन न्यूज नेटवर्क

National News(09/02/2026): श्रीकृष्ण की 16,108 शादियों को लेकर समाज में अक्सर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरा मानवीय और सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। बताया गया कि ये शादियां किसी शौक या व्यक्तिगत इच्छा का परिणाम नहीं थीं, बल्कि समाज द्वारा ठुकराई गई महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा देने का माध्यम थीं।

नरकासुर नामक राक्षस ने 16,100 महिलाओं को बंदी बनाकर कैद कर रखा था। श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार कर उन्हें आज़ादी दिलाई। उस समय के समाज में इन महिलाओं को ‘अपवित्र’ मानकर अपनाने से इंकार कर दिया गया था। उनके सामने या तो अपमान सहने का रास्ता था या जीवन समाप्त करने का। ऐसे में श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा देकर समाज में सम्मान और सुरक्षित जीवन प्रदान किया।

इसके अलावा, श्रीकृष्ण की आठ मुख्य पत्नियों, जिन्हें अष्ट भार्या कहा जाता है, के माध्यम से अलग-अलग मानवीय गुणों को दर्शाया गया है। रुक्मणी को सच्ची भक्ति का प्रतीक बताया गया, सत्यभामा स्वाभिमान की मिसाल हैं, जामवंती अहंकार त्यागने की सीख देती हैं, कालिंदी प्रकृति का स्वरूप हैं, नग्रजती जीवन की कठिन परीक्षाओं का प्रतीक हैं, मित्रवृंदा स्त्री की इच्छा और स्वतंत्रता को दर्शाती हैं, भद्रा परिवार के प्रति प्रेम का उदाहरण हैं और लक्ष्मणा लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति को दर्शाती हैं।

राधा और कृष्ण के संबंध को लेकर भी विशेष दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। बताया गया कि, विवाह दो व्यक्तियों के बीच होता है, जबकि राधा और कृष्ण को एक ही आत्मा के रूप में देखा जाता है। उनका रिश्ता प्रेम के उस स्तर को दर्शाता है, जहां पाने की इच्छा नहीं, बल्कि एक-दूसरे में पूरी तरह समर्पित होने की भावना होती है।

श्रीकृष्ण के पारिवारिक जीवन और प्रबंधन से जुड़ी कथा में बताया गया कि नारद जी के मन में यह जिज्ञासा थी कि इतने बड़े परिवार को समय कैसे दिया जाता है। तब उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण अपनी दिव्य शक्ति से हर घर में अपनी पत्नी के साथ उपस्थित रहते थे। वहीं, यदुवंश के अंत के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जब परिवार में अहंकार प्रवेश करता है, तो उसका विनाश निश्चित होता है। श्रीकृष्ण ने गलत होने पर अपने ही वंशजों का पक्ष नहीं लिया।

इस पूरे प्रसंग के माध्यम से यह संदेश सामने आता है कि, धर्म का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों को सम्मान देना, उनके दुख को समझना और उन्हें सहारा देना ही सच्चा धर्म है।

डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥


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