क्या है UGC Act 2026?, देशभर में क्यों हो रहा इस एक्ट का विरोध

टेन न्यूज़ नेटवर्क

New Delhi News (26 January 2026): विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ यानी यूजीसी एक्ट 2026 को लेकर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। यह नया रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लागू हो चुका है। सरकार और यूजीसी इसे उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सामाजिक न्याय को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं, जबकि अगड़ी जातियों से जुड़े कई संगठन इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। यूपी चुनाव 2027 से पहले इस कानून ने सियासी रंग भी लेना शुरू कर दिया है।

इस नए कानून के तहत अब अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसके अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। अब तक ऐसे प्रकोष्ठ और शिकायत तंत्र मुख्य रूप से एससी-एसटी समुदाय तक सीमित थे।

यूजीसी एक्ट 2026 के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Cell) बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर एक समानता समिति का गठन भी जरूरी होगा, जिसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी।

कानून लागू होते ही इसका विरोध भी तेज हो गया। गाजियाबाद डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने इस एक्ट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वह जंतर-मंतर पर अनशन करने दिल्ली जा रहे थे, लेकिन गाजियाबाद में ही पुलिस ने उन्हें रोककर नजरबंद कर दिया। इस दौरान उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज की आवाज दबाने का आरोप लगाया। उनके रोके जाने के बाद यह मामला और ज्यादा गरमा गया और देशभर में चर्चा का विषय बन गया।

अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस रेगुलेशन का दुरुपयोग हो सकता है। उनका तर्क है कि इसके जरिए सवर्ण छात्रों और शिक्षकों को झूठे जातिगत भेदभाव के मामलों में फंसाया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है, ताकि इस कानून के खिलाफ बड़े स्तर पर आंदोलन किया जा सके। सोशल मीडिया पर भी इसके विरोध में अभियान चलाया जा रहा है।

वहीं सामाजिक न्याय के पक्षधर संगठनों का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में आज भी सवर्ण वर्चस्व कायम है। आजादी के बाद से एससी-एसटी को आरक्षण मिला, ओबीसी को 1990 से नामांकन और 2010 से फैकल्टी भर्ती में आरक्षण दिया गया, लेकिन इसके बावजूद वंचित वर्गों की भागीदारी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो पाई है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 लागू होने के 36 साल बाद भी दलित उत्पीड़न की घटनाएं थमी नहीं हैं।

यूजीसी द्वारा संसद की समिति और सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़े भी इस समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं। पिछले पांच वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2019-20 में जहां 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। 2019-20 से 2023-24 के बीच 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें यूजीसी को प्राप्त हुईं।

कुल मिलाकर यूजीसी एक्ट 2026 को एक ओर सामाजिक समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा का मजबूत प्रयास माना जा रहा है, तो दूसरी ओर अगड़ी जातियों में इसके दुरुपयोग की आशंका को लेकर गहरा असंतोष है। आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का भी बड़ा केंद्र बनता नजर आ रहा है।।


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