भारतीय वैज्ञानिकों की चेतावनी: अस्पतालों में फैल रहा जानलेवा फंगस ‘कैंडिडा ऑरिस’
टेन न्यूज नेटवर्क
National News (14/01/2026): दुनियाभर के डॉक्टरों के लिए ‘कैंडिडा ऑरिस’ नाम का एक फंगस बड़ी चिंता का विषय बन गया है। सरल भाषा में कहें तो यह एक ऐसी बीमारी है जो अस्पतालों में बहुत तेजी से फैल रही है। हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में बताया है कि यह फंगस न केवल फैल रहा है, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस पर आजकल की आम दवाओं का असर होना बंद हो गया है। इस फंगस का पहला मामला 2009 में जापान में मिला था और 2014 तक यह भारत में भी एक बड़े खतरे के रूप में पहचाना जाने लगा। यह फंगस इसलिए भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह अस्पतालों की दीवारों, प्लास्टिक के सामानों और धातुओं जैसे बेड या मेडिकल उपकरण पर चिपक जाता है और लंबे समय तक जिंदा रहता है।
इस फंगस की बनावट बहुत अनोखी और मजबूत होती है। इसकी बाहरी दीवार शक्कर से बनी होती है जो एक शक्तिशाली गोंद की तरह काम करती है। इसी वजह से यह इंसानी त्वचा और अस्पताल के उपकरणों पर मजबूती से चिपक जाता है। यह “चिपचिपाहट” ही इसे एक मरीज से दूसरे मरीज तक पहुँचने में मदद करती है, क्योंकि यह डॉक्टर के औजारों या मेडिकल स्टाफ के जरिए आसानी से फैल जाता है। इतना ही नहीं, यह फंगस हमारे शरीर के बचाव तंत्र को चकमा देने और जरूरत पड़ने पर अपना रूप बदलने में भी माहिर है।
डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस फंगस पर आम एंटी-फंगल दवाइयाँ बेअसर साबित हो रही हैं। कई बार लैब टेस्ट में भी इसकी सही पहचान नहीं हो पाती, जिससे गलत इलाज होने का खतरा बढ़ जाता है और संक्रमण और फैल जाता है। गंभीर मामलों में इस बीमारी से जान जाने का खतरा 50% से भी ज्यादा होता है। फिलहाल दुनिया में इसके इलाज के लिए केवल चार तरह की दवाइयाँ उपलब्ध हैं, जबकि अन्य पर अभी रिसर्च चल रही है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान इस तरह के फंगस को पनपने में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा, अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाओं के बहुत ज्यादा इस्तेमाल ने भी इसे और ताकतवर बना दिया है, जिससे यह दवाओं को बेअसर करना सीख गया है। यह गंदगी में नहीं बल्कि साफ-सुथरे दिखने वाले अस्पतालों की सतहों पर भी लंबे समय तक जीवित रह सकता है।
यह फंगस उन लोगों के लिए सबसे ज्यादा जानलेवा है जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है। इसमें नवजात बच्चे, बुजुर्ग और ऐसे मरीज शामिल हैं जिन्हें पहले से शुगर यानी डायबिटीज या कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ हैं। ऐसे लोगों को अस्पतालों में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि कैंडिडा ऑरिस के खतरे को कम करने के लिए हमें सबसे पहले नई और ताकतवर एंटी-फंगल दवाइयां बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही, ऐसी जांच तकनीकों की भी आवश्यकता है जो बहुत तेजी से और सटीकता के साथ इस फंगस की पहचान कर सकें। इलाज के अलावा, वैज्ञानिक उन लोगों के लिए टीका बनाने पर भी काम कर रहे हैं जिन्हें संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा है।
अस्पतालों में साफ-सफाई के बहुत कड़े नियम लागू करना और सतहों की लगातार निगरानी करना भी जरूरी है ताकि इस जिद्दी फंगस को खत्म किया जा सके। एक और महत्वपूर्ण कदम यह है कि खासकर विकासशील देशों में बीमारियों की सूचना देने वाले सिस्टम को बेहतर बनाया जाए। जब हमें समय पर पता चलेगा कि संक्रमण कहां फैल रहा है, तभी हम इस वैश्विक स्वास्थ्य खतरे को रोक पाएंगे।
डिस्क्लेमर: यह लेख / न्यूज आर्टिकल सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और प्रतिष्ठित / विश्वस्त मीडिया स्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है।यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। पाठक कृपया स्वयं इस की जांच कर सूचनाओं का उपयोग करे ॥
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