तलाक नहीं, हिंसा असली समस्या है: भारत में पारिवारिक न्याय व्यवस्था पर पुनर्विचार का समय
लेखक: संदीप कुमार दुबे, अधिवक्ता एवं मध्यस्थ, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
New Delih (10/07/2026): जब भी किसी वैवाहिक विवाद का अंत पति द्वारा पत्नी की हत्या, पत्नी द्वारा पति पर जानलेवा हमला, आत्महत्या या किसी अन्य हिंसक घटना में होता है, तब पूरा समाज एक ही प्रश्न पूछता है—आख़िर ऐसा हुआ क्यों?
इस प्रश्न का उत्तर तलाक में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया में छिपा है जिसमें मतभेद धीरे-धीरे घृणा, प्रतिशोध और हिंसा में बदल जाते हैं। यहीं पर समाज, परिवार, न्याय व्यवस्था और हमारी सामाजिक सोच—सभी को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
एक अधिवक्ता एवं मध्यस्थ के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि तलाक समाज की विफलता नहीं है, हिंसा समाज की सबसे बड़ी विफलता है। कानून प्रत्येक व्यक्ति को असफल या असहनीय विवाह से सम्मानपूर्वक बाहर निकलने का अधिकार देता है। लेकिन कोई भी कानून किसी को हिंसा, प्रताड़ना या किसी की जान लेने का अधिकार नहीं देता।
भारत में पारिवारिक कानून समय के साथ अधिक संवेदनशील और अधिकार-आधारित बने हैं। महिलाओं, बच्चों और अन्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। न्यायालय अधिकारों का निर्धारण कर सकते हैं, लेकिन टूटे हुए विश्वास को नहीं जोड़ सकते और न ही भावनात्मक घावों को भर सकते हैं। यही कारण है कि मध्यस्थता (Mediation), पारिवारिक परामर्श (Counselling) और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को हमारी पारिवारिक न्याय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
अधिकांश वैवाहिक विवाद हिंसा से शुरू नहीं होते। वे छोटे-छोटे मतभेदों, आर्थिक तनाव, संवाद की कमी, अविश्वास, पारिवारिक हस्तक्षेप और भावनात्मक दूरी से जन्म लेते हैं। यदि इन्हें समय रहते समझदारी से नहीं सुलझाया जाता, तो यही मतभेद वर्षों की कटुता, मुकदमेबाजी और अंततः हिंसा का रूप ले सकते हैं।
इस स्थिति को बदलने के लिए समाज को अपनी भूमिका बदलनी होगी।
परिवारों को विवाद भड़काने वाला नहीं, बल्कि समाधान का माध्यम बनना होगा। माता-पिता, रिश्तेदार और मित्र यदि अहंकार, प्रतिशोध और पक्षपात को बढ़ावा देने के बजाय संवाद, धैर्य और सम्मान का वातावरण तैयार करें, तो अनेक परिवार टूटने से पहले संभल सकते हैं। यदि अलग होना ही पड़े, तो भी वह गरिमा और शांति के साथ हो।
हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था पर भी पुनर्विचार करना होगा। हम बच्चों को विज्ञान, गणित और तकनीक तो सिखाते हैं, लेकिन संवाद, भावनात्मक संतुलन, मतभेदों का समाधान और स्वस्थ संबंधों की शिक्षा बहुत कम देते हैं। एक संवेदनशील समाज केवल मजबूत कानूनों से नहीं, बल्कि मजबूत मानवीय मूल्यों से बनता है।
न्याय व्यवस्था को भी प्रारंभिक स्तर पर विवाद समाधान को प्रोत्साहित करना चाहिए। प्री-लिटिगेशन फैमिली मेडिएशन और पारिवारिक परामर्श को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए, ताकि लोग वर्षों तक मुकदमों में उलझने के बजाय समय रहते समाधान खोज सकें। जब पुनर्मिलन संभव न हो, तब भी मध्यस्थता के माध्यम से सम्मानजनक और शांतिपूर्ण अलगाव सुनिश्चित किया जा सकता है।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जहाँ घरेलू हिंसा, गंभीर उत्पीड़न या जीवन को वास्तविक खतरा हो, वहाँ सबसे पहली प्राथमिकता पीड़ित की सुरक्षा होनी चाहिए। ऐसे मामलों में कानून को त्वरित, निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए। जीवन की रक्षा किसी भी समझौते से अधिक महत्वपूर्ण है।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। केवल सनसनीखेज घटनाओं को दिखाना पर्याप्त नहीं है। मीडिया को उन सामाजिक कारणों और समाधान पर भी चर्चा करनी चाहिए जो ऐसी घटनाओं को होने से रोक सकते हैं। प्रत्येक दुखद घटना समाज को यह सोचने का अवसर दे कि हम संवाद, मध्यस्थता और मानसिक स्वास्थ्य को कैसे मजबूत बना सकते हैं।
आज आवश्यकता केवल तलाक की संख्या कम करने की नहीं, बल्कि हिंसक तलाक की घटनाओं को रोकने की है। इसके लिए सरकार, न्यायपालिका, अधिवक्ता, मध्यस्थ, मनोवैज्ञानिक, शिक्षण संस्थान, सामाजिक संगठन, धार्मिक नेतृत्व और प्रत्येक परिवार को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
मेरा विश्वास है कि न्याय का सर्वोच्च उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि अपराध होने से पहले मानव जीवन की रक्षा करना भी है। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी मानी जाए; जहाँ अहंकार की जगह संवाद हो; और जहाँ संबंध समाप्त होने पर भी मानवता जीवित रहे।
मेरा समाज से विनम्र आग्रह है—
“यदि विवाह नहीं बच सकता, तो कम से कम जीवन बचाइए। यदि साथ चलना संभव नहीं है, तो सम्मान के साथ अलग हो जाइए। तलाक एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन हिंसा एक जघन्य अपराध है। कोई भी रिश्ता इतना बड़ा नहीं हो सकता कि उसके लिए किसी की जान ले ली जाए या अपनी जान दे दी जाए।”
एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ कितने विवाह टूटते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ मतभेदों का समाधान कितनी संवेदनशीलता, गरिमा और शांति के साथ किया जाता है।
यदि भारत को वास्तव में सुरक्षित, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज बनाना है, तो हमें ऐसी पारिवारिक न्याय व्यवस्था विकसित करनी होगी जो केवल निर्णय न दे, बल्कि संवाद को बढ़ावा दे, सम्मान की रक्षा करे और सबसे बढ़कर मानव जीवन को सर्वोच्च महत्व दे।
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