हरित प्रौद्योगिकी को अपनाएं और नैतिक सुशासन को बढ़ावा दें, तभी संभव होगा नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य

लेखक: प्रो. पी.बी. शर्मा

National News (11/06/2026): 21वीं सदी में मानवता एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां एक ओर विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अभूतपूर्व प्रगति कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और बड़े डेटा विश्लेषण के माध्यम से विकास की नई ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं दूसरी ओर बुद्धिमान मशीनों और एल्गोरिदम आधारित प्रणालियों के कारण रोजगार के अवसरों पर संकट की आशंका भी बढ़ रही है।

हालांकि रोजगार को लेकर यह बहस अभी जारी है, लेकिन पूरी दुनिया आज एक और गंभीर चुनौती का सामना कर रही है, जिसे “ट्रिपल प्लैनेटरी क्राइसिस” कहा जाता है। इसमें जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण तथा जैव विविधता एवं हरित आवरण का तेजी से घटता स्तर शामिल है।

धरती पर बदलती परिस्थितियां कई क्षेत्रों में भीषण गर्मी और अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड जैसी स्थितियां पैदा कर रही हैं। दिल्ली-एनसीआर और भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों में हाल के दिनों में महसूस की गई भीषण गर्मी इस बात का संकेत है कि यदि प्रकृति के अंधाधुंध दोहन पर रोक नहीं लगाई गई और सभी देश मिलकर जलवायु संकट से निपटने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास नहीं करते, तो आने वाले समय में परिस्थितियां और गंभीर हो सकती हैं।

नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लिए वैश्विक संकल्प

सीओपी-2026 में दुनिया के देशों ने वर्ष 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने के लिए प्रभावी हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाने पर सहमति व्यक्त की थी। इस लक्ष्य को वास्तविकता में बदलने के लिए विकास और तकनीकी नवाचार के वर्तमान मॉडल में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है।

इंजीनियरिंग, डिजिटल परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को पर्यावरणीय जवाबदेही के साथ जोड़ना होगा, ताकि विकास और स्थिरता दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकें। अब केवल लाभ और उत्पादन बढ़ाने वाली तकनीकों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य की तकनीकें ऐसी होनी चाहिए जो कार्बन उत्सर्जन कम करें, जलवायु लचीलापन बढ़ाएं और मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दें।

एआई को बनाना होगा जलवायु समाधान का माध्यम

अब तक तकनीकी उद्योग ने एआई की ऊर्जा खपत को गंभीरता से नहीं लिया है। विशाल एआई मॉडल और डेटा सेंटरों को संचालित करने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की आवश्यकता होती है। इससे ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय दबाव बढ़ने की आशंका है।

ऐसे में “ग्रीन एआई” की अवधारणा को अपनाना आवश्यक है, जिसमें एल्गोरिदम केवल सटीकता के लिए नहीं बल्कि ऊर्जा दक्षता के लिए भी विकसित किए जाएं। डेटा सेंटरों को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर आधारित बनाया जाए तथा पानी की खपत को भी न्यूनतम किया जाए। भविष्य के एआई चिप्स और स्मार्ट प्रणालियों के विकास में भी स्थिरता को प्रमुख स्थान देना होगा। अब समय आ गया है कि हम “ग्रीन चिप्स” की मांग को आगे बढ़ाएं।

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में एआई की भूमिका

यदि एआई को पर्यावरणीय जवाबदेही के साथ जोड़ा जाए तो यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार बन सकता है।

स्मार्ट ग्रिड प्रबंधन

एआई आधारित प्रणालियां ऊर्जा मांग का पूर्वानुमान लगाकर सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को बिजली ग्रिड में प्रभावी रूप से शामिल कर सकती हैं, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी।

सटीक कृषि

उपग्रह चित्रों और सेंसर डेटा के विश्लेषण से एआई पानी की खपत कम करने, उर्वरकों के उपयोग को नियंत्रित करने और मिट्टी के स्वास्थ्य की निगरानी करने में मदद कर सकता है।

जलवायु मॉडलिंग

एआई आधारित मॉडल स्थानीय स्तर पर जलवायु प्रभावों का आकलन कर सकते हैं, जिससे शहरों को अत्यधिक गर्मी और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों के लिए बेहतर ढंग से तैयार किया जा सकेगा।

शहरी नियोजन और नागरिक सेवाएं

डिजिटल ट्विन तकनीक और एआई की सहायता से शहरों, उद्योगों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के कार्बन फुटप्रिंट का पूर्व आकलन किया जा सकता है, जिससे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और अपशिष्ट कम करने में मदद मिलेगी।

कार्बन ट्रैकिंग के लिए ब्लॉकचेन

ब्लॉकचेन तकनीक कार्बन क्रेडिट, उत्सर्जन आंकड़ों और आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता को पारदर्शी और सत्यापित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सर्कुलर इकोनॉमी की ओर बढ़ना होगा

भविष्य की इंजीनियरिंग और विनिर्माण प्रणाली “टेक-मेक-वेस्ट” मॉडल पर आधारित नहीं हो सकती। अब उत्पादों को इस तरह डिजाइन करना होगा कि उनका जीवनकाल लंबा हो, उनकी मरम्मत संभव हो और अंततः उन्हें पुनर्चक्रित किया जा सके।

इसके लिए आवश्यक है:

4R सिद्धांत—Reduce, Repair, Recycle और Reuse—को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए।

विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए।

जिम्मेदार उपभोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक अभियान चलाए जाएं।

अपशिष्ट से संसाधन पुनर्प्राप्ति के लिए अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा दिया जाए।

हरित प्रौद्योगिकी में निवेश बढ़ाने की जरूरत

सरकारों और उद्योगों को हरित ऊर्जा, जैव ईंधन, ग्रीन हाइड्रोजन, उच्च क्षमता वाली बैटरियों, स्मार्ट माइक्रोग्रिड, कार्बन कैप्चर तकनीकों तथा जल संरक्षण प्रणालियों के विकास में निवेश बढ़ाना होगा। भविष्य का तकनीकी विकास केवल लाभ केंद्रित न होकर सामाजिक और पर्यावरणीय आवश्यकताओं पर आधारित होना चाहिए। इसे “रिलेवेंस-ड्रिवन इंजीनियरिंग” और “टेक्नोलॉजी ऑफ कॉन्शियंस” के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।

हरित सुशासन समय की मांग

प्रौद्योगिकी स्वयं में केवल एक साधन है। उसका उपयोग किस दिशा में होगा, यह शासन व्यवस्था तय करती है। इसलिए सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ऐसे सख्त नियामक ढांचे विकसित करने होंगे जो हरित तकनीकों को बढ़ावा दें और पर्यावरणीय जवाबदेही सुनिश्चित करें।

नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को कॉर्पोरेट संचालन से कानूनी रूप से जोड़ना होगा। साथ ही एआई और स्वचालन से होने वाले आर्थिक लाभ का एक हिस्सा “ग्रीन री-स्किलिंग” कार्यक्रमों में निवेश किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य की कार्यशक्ति हरित अर्थव्यवस्था का नेतृत्व कर सके।

दुनिया के सामने खड़ा पर्यावरणीय संकट एक स्पष्ट चेतावनी है। अब आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि हम डिजिटल परिवर्तन में नैतिक सुशासन को शामिल करें और अपनी तकनीकी क्षमता को पृथ्वी के संरक्षण के लिए समर्पित करें, तो वर्ष 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना संभव है।

(लेखक प्रो. पी.बी. शर्मा, एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज़ के पूर्व अध्यक्ष, दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति एवं वर्तमान में अमिटी यूनिवर्सिटी गुरुग्राम के कुलपति हैं।)


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