National News (28/05/2026): भारत में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह तेजी से जनस्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ा एक बड़ा संकट बनती जा रही है। हाल ही में जारी एक अध्ययन में सामने आया है कि देश के 57 प्रतिशत जिलों में अत्यधिक गर्मी का खतरा बेहद गंभीर स्तर तक पहुंच चुका है। इन क्षेत्रों में देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी निवास करती है, यानी हर चार में से तीन भारतीय ऐसे इलाकों में रह रहे हैं जहां हीटवेव का सीधा असर उनके स्वास्थ्य, कामकाज और जीवनशैली पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के साथ-साथ रातों का गर्म रहना सबसे अधिक चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब रात में भी तापमान कम नहीं होता, तब शरीर को दिनभर की गर्मी से राहत नहीं मिल पाती, जिससे हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन, हृदय और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
अध्ययन में देशभर के 734 जिलों का विस्तृत मूल्यांकन किया गया। इसके लिए 35 अलग-अलग मानकों को आधार बनाया गया, जिनमें तापमान, आर्द्रता, जनसंख्या घनत्व, स्वास्थ्य जोखिम, आर्थिक स्थिति और संवेदनशील आबादी जैसे पहलू शामिल हैं। 1982 से 2022 तक के मौसम संबंधी आंकड़ों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि पिछले चार दशकों में हीटवेव की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं और उनका प्रभाव पहले से अधिक गंभीर होता गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बीते 10 वर्षों में अत्यधिक गर्म रातों की संख्या में तेज वृद्धि हुई है। कई जिलों में गर्मियों के दौरान औसतन पांच या उससे अधिक अतिरिक्त गर्म रातें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले श्रमिकों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है।
अत्यधिक हीट रिस्क वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, केरल, गोवा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश प्रमुख रूप से शामिल हैं। खासतौर पर पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर बताई जा रही है, जहां बड़ी संख्या में जिले हाई-रिस्क जोन में पहुंच चुके हैं।
दिल्ली के शहरी इलाकों में भी गर्मी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार के कृषि क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से खेती और श्रमिकों की कार्यक्षमता पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
अत्यधिक गर्मी केवल स्वास्थ्य संकट ही नहीं, बल्कि एक आर्थिक चुनौती भी बनती जा रही है। बढ़ते तापमान के कारण श्रमिकों की उत्पादकता घट रही है, बिजली की मांग बढ़ रही है और जल संकट गहराता जा रहा है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने, हीट एक्शन प्लान लागू करने, सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल और शीतलन सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है और इससे निपटने के लिए सरकारों के साथ-साथ समाज को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।।
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