अखिलेश को खाना परोसना कर्मचारी को पड़ा भारी? बेटी के बयान से बढ़ी सियासी हलचल
टेन न्यूज नेटवर्क
Uttar Pradesh News (07/05/2026): उत्तर प्रदेश में अंबेडकर जयंती (Ambedkar Jayanti) के दौरान आयोजित एक भंडारे से जुड़ा मामला अब राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav को भोजन परोसने के बाद एक सफाई कर्मचारी के डिमोशन (Demotion) की खबर ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में अब कर्मचारी की बेटी का भावुक बयान भी चर्चा का केंद्र बन गया है, जिसने सोशल मीडिया पर तेज़ी से सुर्खियां बटोरी हैं।
बताया जा रहा है कि अंबेडकर जयंती कार्यक्रम में ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी उमेश कुमार ने भंडारे के दौरान अखिलेश यादव को भोजन परोसा था। कुछ समय बाद प्रशासनिक स्तर पर उनका पद बदल दिया गया और उन्हें सफाई कार्य से जुड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई। परिवार का आरोप है कि यह कार्रवाई केवल राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़ने की वजह से की गई, जबकि प्रशासन इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहा है।
मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब कर्मचारी की बेटी अंजलि मौर्य समाजवादी पार्टी कार्यालय पहुंची और अखिलेश यादव से मुलाकात की। इस दौरान उसने भावुक अंदाज में कहा कि “सर, आपके लिए ऐसी सौ नौकरियां भी कुर्बान हैं।” उसका यह बयान इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते यह मामला राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया।
परिवार का कहना है कि उमेश कुमार को बिना किसी ठोस वजह के निशाना बनाया गया है। उनका आरोप है कि एक सामान्य कर्मचारी को राजनीतिक द्वेष का शिकार बनाया जा रहा है। वहीं प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष अलग है। अधिकारियों के मुताबिक कर्मचारी के खिलाफ पहले से कई शिकायतें लंबित थीं और विभागीय प्रक्रिया के तहत ही जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया है। प्रशासन इसे नियमित कार्यवाही बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता का दबाव करार दे रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर अखिलेश यादव ने भी राज्य सरकार को घेरा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीडीए वर्ग से जुड़े लोगों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है और सरकार विरोधी विचार रखने वालों को परेशान किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी इस मामले को सामाजिक सम्मान और अधिकारों से जोड़कर देख रही है।
दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक कर्मचारी के तबादले या डिमोशन तक सीमित नहीं रह गया है। अब यह मुद्दा प्रशासनिक निष्पक्षता, राजनीतिक दबाव और सामाजिक संवेदनाओं से जुड़ी बहस में बदल चुका है। सोशल मीडिया पर भी लोग दो धड़ों में बंटे दिखाई दे रहे हैं। एक पक्ष कर्मचारी परिवार के समर्थन में भावनात्मक प्रतिक्रिया दे रहा है, जबकि दूसरा पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया को सही ठहरा रहा है।
फिलहाल यह मामला प्रदेश की राजनीति में लगातार तूल पकड़ता जा रहा है और आने वाले दिनों में इसके और अधिक राजनीतिक रूप लेने की संभावना जताई जा रही है।।
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