EPFO पेंशन पर पुनर्विचार की जरूरत: पारदर्शिता और बढ़ोतरी दोनों जरूरी

टेन न्यूज नेटवर्क,रंजन अभिषेक ,संवाददाता

National News (20 अप्रैल 2026): श्रम, वस्त्र और कौशल विकास से संबंधित स्थायी समिति ने केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की अनुदान मांगों पर अपनी रिपोर्ट में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत मिलने वाली न्यूनतम मासिक पेंशन को संशोधित करने की तत्काल आवश्यकता दोहराई है। वर्तमान में कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) के तहत ₹1000 की न्यूनतम पेंशन अगस्त 2014 में तय की गई थी, जिसमें एक दशक से अधिक समय से कोई बदलाव नहीं हुआ है। समिति ने इसे वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के हिसाब से अपर्याप्त बताया है और इसमें वृद्धि की जरूरत पर जोर दिया है।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है। 2014 में जब न्यूनतम पेंशन का प्रस्ताव रखा गया था, तब विपक्ष में रही भाजपा ने इसे बहुत कम बताते हुए कम से कम ₹3000 करने की मांग की थी। हालांकि, वर्तमान में केंद्र सरकार पर इस राशि को बढ़ाने को लेकर दबाव बढ़ रहा है। सरकार फिलहाल न्यूनतम पेंशन भुगतान के लिए औसतन करीब ₹980 करोड़ सालाना खर्च करती है, जबकि इसे सार्थक रूप से बढ़ाने के लिए यह खर्च तीन गुना तक बढ़ाना पड़ सकता है। EPS कोष में केंद्र सरकार वेतन का 1.16% योगदान करती है, जिसे 2024-25 में संशोधित कर ₹9250 करोड़ किया गया और 2025-26 में इसके ₹10,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इसके बावजूद सरकार अतिरिक्त वित्तीय बोझ का हवाला दे रही है।

उधर, उच्च वेतन के आधार पर पेंशन का विकल्प चुनने वाले आवेदकों को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। कई आवेदकों को लाखों रुपये के डिमांड नोटिस जारी किए गए हैं, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही कि उन्हें भविष्य में कितनी पेंशन मिलेगी या कितना एरियर मिलेगा। EPFO की ओर से पारदर्शिता की कमी के चलते आवेदकों को पोर्टल आधारित कैलकुलेटर पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिसकी सटीकता को लेकर भी कोई ठोस आश्वासन नहीं है। इससे पेंशनभोगियों में असंतोष बढ़ रहा है।

छूट प्राप्त प्रतिष्ठानों से जुड़े पेंशनभोगियों की स्थिति और भी जटिल बताई जा रही है। कई मामलों में उच्च पेंशन के आवेदन बिना कारण खारिज कर दिए गए हैं, जबकि पहले से स्वीकृत पेंशन को भी रोकने की शिकायतें सामने आई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की भारी कमी है, जिसे दूर करना जरूरी है।

इसी बीच, पेंशनभोगियों में असंतोष खुलकर सामने आया है। 9, 10 और 11 मार्च को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों पेंशनभोगियों ने विरोध प्रदर्शन किया और न्यूनतम पेंशन को ₹1000 से बढ़ाकर ₹7500 करने की मांग उठाई। पेंशनभोगी संगठनों का कहना है कि लोग 30-35 वर्षों तक EPFO में योगदान देने के बावजूद औसतन केवल ₹1171 मासिक पेंशन पा रहे हैं, जिससे रोजमर्रा का खर्च चलाना बेहद मुश्किल हो गया है। उनका आरोप है कि कई सरकारी योजनाएं बिना योगदान के भी बेहतर पेंशन दे रही हैं, जबकि नियमित योगदान करने वालों को पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा।

सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2022 के फैसले के बाद उच्च पेंशन के मामलों में भी प्रगति हुई है। सरकार के अनुसार, 31 जनवरी 2025 तक संयुक्त विकल्प के लिए करीब 15.24 लाख आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से 9 मार्च 2026 तक 99.2% से अधिक आवेदनों का निपटान किया जा चुका है। पात्र आवेदकों को डिमांड लेटर जारी किए गए हैं और आवश्यक राशि जमा करने तथा फॉर्म 10D भरने वाले रिटायर्ड कर्मचारियों को पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) भी जारी किए जा चुके हैं। वहीं, जो कर्मचारी अभी सेवा में हैं, उन्हें 58 वर्ष की आयु पूरी करने और क्लेम दाखिल करने के बाद PPO जारी किया जाएगा।

कुल मिलाकर, EPFO पेंशन का मुद्दा अब केवल वित्तीय नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शिता से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है। विशेषज्ञों और समिति ने सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार को सभी हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा कर पेंशन में बढ़ोतरी, प्रक्रिया में सुधार और सभी पेंशनभोगियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि देश के लाखों वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन मिल सके।।


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