National News (05/01/2026): भारत के लिए यह खबर जितनी खुशी लेकर आई है, उतनी ही चिंता भी बढ़ा दी है। एक तरफ तो हमें गर्व है कि पूरी दुनिया के 75% बाघ यानी करीब 3,682 हमारे यहाँ हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक परेशान करने वाली खबर भी है। साल 2025 में भारत में 166 बाघों की मौत हुई, जबकि 2024 में यह गिनती 126 थी। यानी बाघों के मरने की तादाद बढ़ रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि: क्या बाघों की बढ़ती आबादी ही अब उनकी जान के लिए मुसीबत बन रही है?
बाघों की मौत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह जंगलों में जगह की भारी कमी है। इसे ऐसे समझिए कि एक जवान नर बाघ को रहने के लिए करीब 60 से 100 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए होता है, वहीं मादा बाघ को 40 से 60 वर्ग किलोमीटर की जगह चाहिए। अब जैसे-जैसे बाघों की गिनती बढ़ रही है, हमारे कई टाइगर रिजर्व पूरी तरह भर चुके हैं। ऐसे में जब बाघ नए इलाके की तलाश में अपनी सुरक्षित सीमा से बाहर निकलते हैं, तो उनके बीच इलाके पर कब्जे को लेकर खूनी जंग छिड़ जाती है।
इस आपसी लड़ाई में अक्सर कमज़ोर बाघ और छोटे बच्चे मारे जाते हैं। इसके अलावा, जब बाघ के बच्चे करीब 20 महीने बाद अपनी माँ का साथ छोड़कर अपना नया ठिकाना ढूंढने निकलते हैं और उन्हें कोई खाली जगह नहीं मिलती, तो इलाके पर कब्जे की इस लड़ाई में उनकी जान को बहुत बड़ा खतरा बना रहता है।
जब बाघ अपने सुरक्षित जंगलों से बाहर निकलते हैं, तो उनका सामना इंसानी बस्तियों और शहरों से होता है, जो उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है। दरअसल, बाघ एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल करते हैं, वे अब सुरक्षित नहीं रहे क्योंकि वहां सड़कें, रेलवे लाइनें और शहर बस गए हैं। इसके अलावा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कई बाघों की जान हादसों की वजह से भी जा रही है। हालांकि बहुत सी मौतें प्राकृतिक हैं, लेकिन कई बाघ उन फंदों में फंसकर मर रहे हैं जो शिकारियों ने जंगली सूअरों के लिए बिछाए होते हैं। साथ ही, खेतों के आसपास अवैध रूप से लगाई गई बिजली की बाड़ से लगने वाला करंट भी उनकी मौत की एक बड़ी वजह बन रहा है।
अगर हम आंकड़ों को देखें तो मध्य प्रदेश, जिसे ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है, वहां सबसे ज्यादा बाघों की आबादी है लेकिन वहीं सबसे ज्यादा 55 मौतें भी दर्ज हुई हैं। मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र में 38, केरल में 13 और असम में 12 बाघों ने अपनी जान गंवाई है। यह स्थिति दिखाती है कि जिन राज्यों में बाघों की संख्या जितनी ज्यादा है, वहां जगह की कमी और संघर्ष की वजह से उनके मरने का खतरा भी उतना ही बढ़ता जा रहा है।
बाघों को बचाने के लिए 1973 में शुरू हुए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ ने कमाल का काम किया है। इसकी वजह से साल 2006 में जहाँ सिर्फ 1,411 बाघ बचे थे, वहीं आज इनकी गिनती बढ़कर 3,600 के पार पहुँच गई है। लेकिन अब सिर्फ संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, क्योंकि जगह कम पड़ रही है।
आगे के लिए सरकार को अपना तरीका बदलना होगा। अब सारा ध्यान जंगलों के दायरे को बढ़ाने, बाघों के आने-जाने वाले रास्तों को सुरक्षित करने और इंसानों व जानवरों के बीच होने वाले टकराव को रोकने पर देना होगा। इसी कड़ी में 5 जनवरी 2026 से तमिलनाडु से एक नई बाघ गणना (All India Tiger Estimation) शुरू हुई है। इसमें M-STrIPES जो मोबाइल ऐप हैं, कैमरा ट्रैप और जेनेटिक सैंपलिंग जैसी हाई-टेक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि सही आंकड़े मिल सकें और बाघों के भविष्य के लिए बेहतर योजना बनाई जा सके।
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