मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाना आसान नहीं, क्या विपक्ष की मुहिम से भाजपा पर बढ़ेगा दबाव?
रंजन अभिषेक, टेन न्यूज नेटवर्क
New Delhi News (11 अक्टूबर 2026): मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल दिया है। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। इस विरोध में इंडिया गठबंधन के अलावा कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) भी सक्रिय हैं। विपक्ष की मांग मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की है। हालांकि, संवैधानिक प्रावधानों के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना बेहद जटिल प्रक्रिया है।
दरअसल, विपक्षी दलों की नाराजगी उस रिपोर्ट के बाद और बढ़ गई, जिसमें दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और आयुक्तों के बीच मतभेदों का जिक्र किया गया था। इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर अपना विरोध तेज कर दिया।
SIR और फॉर्म-6 को लेकर क्या हैं विवाद?
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति के प्रमुख मुद्दों में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) की प्रक्रिया शामिल थी। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में प्रस्तावित बदलावों पर भी आपत्ति जताए जाने का दावा किया गया। रिपोर्ट में विशेष रूप से नए मतदाताओं से उनके दादा-दादी या नाना-नानी के पुराने चुनावी रिकॉर्ड का विवरण मांगने संबंधी प्रावधान का उल्लेख किया गया था।
इसके अलावा, चुनावी रिकॉर्ड को दिल्ली स्थित केंद्रीय मुख्यालय में केंद्रीकृत करने के प्रस्ताव पर भी असहमति की बात सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
विपक्षी दल इन दावों को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का आधार बना रहे हैं। कांग्रेस लगातार SIR प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां जताती रही है और इसे ‘वोट चोरी’ से जोड़कर आरोप लगाती रही है। हालांकि, रिपोर्ट में सामने आए दावों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा उनके आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना अलग विषय है।
अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को मिली है सुरक्षा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना और मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकार के दबाव से बचाना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है। इसके लिए दो आधार निर्धारित हैं- सिद्ध दुर्व्यवहार और अक्षमता।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए केंद्र सरकार केवल अपनी इच्छा से फैसला नहीं कर सकती। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति औपचारिक आदेश जारी करते हैं।
वहीं, अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश आवश्यक होती है।
कैसे हटाए जा सकते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है। इसके प्रमुख चरण इस प्रकार हैं-
1. संसद में प्रस्ताव पेश करना: लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से हटाने का प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। प्रस्ताव संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति को सौंपा जाता है।
2. प्रस्ताव स्वीकार करना: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। प्रस्ताव स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है।
3. आरोपों की जांच: समिति में सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं। समिति आरोपों की जांच करती है और संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।
4. संसद में मतदान: यदि जांच समिति आरोपों को सिद्ध पाती है, तो प्रस्ताव पर आगे की संसदीय प्रक्रिया होती है। इसे संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित करना आवश्यक है। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मत प्रस्ताव के पक्ष में होने चाहिए।
5. राष्ट्रपति का आदेश: दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति को औपचारिक संबोधन भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में जांच, संसदीय बहुमत और संवैधानिक औपचारिकताओं की अनिवार्यता के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना आसान नहीं है। राजनीतिक विरोध या किसी रिपोर्ट में सामने आए मतभेद अपने आप में पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
चुनाव आयुक्तों को लेकर पहले भी हो चुके हैं विवाद
चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर राजनीतिक दलों के बीच टकराव नया नहीं है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और एनडीए ने तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग उठाई थी। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में 200 से अधिक सांसदों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चावला को पद से हटाने की मांग की थी। उस समय उनके गांधी-नेहरू परिवार से कथित करीबी संबंधों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।
इससे पहले 1990 से 1996 के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन. शेषन का कार्यकाल भी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर चर्चा में रहा। शेषन ने चुनावों में धनबल और बाहुबल पर अंकुश लगाने, आदर्श आचार संहिता लागू कराने और मतदाता पहचान पत्र को बढ़ावा देने के लिए सख्त कदम उठाए थे। उनके कामकाज के तरीके को लेकर कई राजनीतिक दलों ने विरोध किया था। उन्हें पद से हटाने की कोशिश भी हुई, लेकिन संबंधित प्रस्ताव सफल नहीं हो सका।
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि चुनाव आयोग की भूमिका और मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकार लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट के आधार पर अंतरिम आदेश देने से किया परहेज
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी राजनीतिक विरोध के बीच इस विवाद से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी, राकेश कुमार सिंह और सुधाकर सिंह की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर अंतरिम आदेश पारित करने से परहेज किया। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि किसी रिपोर्ट में सामने आए दावे सही भी हो सकते हैं और गलत भी। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाकर अंतरिम राहत देना उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने आयुक्तों के बीच मतभेदों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया। आयोग का कहना है कि फैसले लेने की प्रक्रिया में असहमति हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। आयोग ने SIR को संवैधानिक और नियमों के अनुरूप बताया है।
फॉर्म-6 को लेकर भी आयोग की ओर से कहा गया कि उसमें केवल एक घोषणा जोड़ी गई है। विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के आरोपों पर आयोग ने कहा कि बड़ी भीड़ के साथ बातचीत संभव नहीं है और सीमित प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात के लिए समय मांगे जाने की जानकारी नहीं थी।
भाजपा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों की मुहिम के बीच भाजपा उनके बचाव में उतर आई है। विपक्ष जहां चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन को लेकर पलटवार कर रही है।
भाजपा का तर्क है कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच कांग्रेस को अपनी चुनावी हार की वजहों पर भी विचार करना चाहिए। इस तरह विवाद अब केवल चुनाव आयोग के फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका राजनीतिक असर भी दिखाई देने लगा है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले तेज हुई सियासी हलचल
फरवरी-मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में चुनाव आयोग और SIR को लेकर विपक्ष का आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इन पांच राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भाजपा या उसके नेतृत्व वाले गठबंधन की सरकार है, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के सामने इन राज्यों में चुनावी जमीन मजबूत करने की चुनौती है।
ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जारी आंदोलन का आगामी चुनावों पर क्या असर पड़ेगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। संवैधानिक प्रक्रिया की जटिलता को देखते हुए ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को व्यावहारिक रूप देना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है। अब यह राजनीतिक बहस का विषय है कि इस मुहिम से विपक्ष चुनाव आयोग पर दबाव बनाने में कितना सफल होता है और इसका आगामी विधानसभा चुनावों में उसे कितना लाभ मिलता है।।
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