National News (14 September 2026): नारियल की भूसी से निकलने वाला कॉयर रेशा अब सिर्फ चटाई और रस्सी बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, महिला सशक्तिकरण और उद्यमिता का मजबूत माध्यम बनता जा रहा है। प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल इस रेशे से चटाइयां, रस्सियां, हस्तशिल्प, बागवानी उत्पाद, जैव-उर्वरक और आधुनिक पैकेजिंग सामग्री जैसे कई मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के कॉयर बोर्ड और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम यानी पीएमईजीपी के सहयोग से पारंपरिक कॉयर गतिविधियों को आधुनिक कारोबार में बदलने की दिशा में काम हो रहा है।
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम की अल्लम गौथमी ने कॉयर अपशिष्ट को उद्यम में बदलकर इसकी बड़ी मिसाल पेश की है। धवलेश्वरम स्थित कॉयर बोर्ड प्रशिक्षण केंद्र से विशेष प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने वर्ष 2024-25 में 10 लाख रुपये की परियोजना लागत से एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स की स्थापना की। इसके लिए उन्हें 6.50 लाख रुपये का बैंक ऋण और पीएमईजीपी के तहत सहायता मिली। उनकी इकाई में पर्यावरण-अनुकूल दरवाजे की चटाइयां, रस्सियां, सजावटी गुड़िया और हस्तशिल्प तैयार किए जाते हैं। इस उद्यम ने करीब 35 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार और लगभग 10 लाख रुपये का लाभ अर्जित किया है, जबकि छह महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है। गौथमी ने करीब 120 महिलाओं को कॉयर चटाई बुनाई, रस्सी बनाने और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण भी दिया है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में करीब पांच अतिरिक्त कॉयर इकाइयां स्थापित करने को प्रोत्साहन मिला।
केरल के कोझिकोड के पी. सुरेंद्रन ने कॉयर पिथ को टिकाऊ कृषि के अवसर में बदलने का काम किया है। उन्होंने नवंबर 2024 में संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज की स्थापना की। कन्नूर स्थित कॉयर बोर्ड और कलावूर स्थित केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता हासिल करने के बाद उन्होंने कॉयर पिथ से पर्यावरण-अनुकूल जैव-उर्वरक का उत्पादन शुरू किया। यह जैव-उर्वरक मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। केवल एक वर्ष में उनके उद्यम ने 500 से अधिक ग्राहकों का आधार तैयार किया, 20 टन से ज्यादा जैव-उर्वरक की बिक्री की और 13 लाख रुपये का कारोबार किया। वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 4 लाख रुपये का लाभ हुआ और इकाई में पांच लोगों को रोजगार मिला, जिनमें दो महिलाएं हैं।
भारत के ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था में कॉयर का लंबा इतिहास रहा है। देश में संगठित कॉयर उत्पादन की शुरुआत वर्ष 1859 में केरल के अलाप्पुझा में पहली कॉयर फैक्ट्री की स्थापना के साथ हुई थी। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक देश है और वैश्विक कॉयर रेशा उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। इस क्षेत्र का महिला रोजगार से भी गहरा संबंध है, क्योंकि रेशा निकालने और उसकी कताई के काम में लगे लोगों में करीब 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस तरह कॉयर की पूरी मूल्य श्रृंखला नारियल किसानों, ग्रामीण कामगारों, महिला कारीगरों, सहकारी समितियों, उद्यमियों, निर्माताओं और निर्यातकों को जोड़ती है।
कॉयर को बढ़ावा देने के लिए कॉयर बोर्ड, एमएसएमई मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय के रूप में कौशल विकास, तकनीकी सहायता, अनुसंधान, बाजार संवर्धन, निर्यात और कामगार कल्याण से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ा रहा है। कॉयर विकास योजना के तहत प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान, कौशल विकास, महिला प्रशिक्षण, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार संवर्धन, उद्योग विकास तथा कामगार कल्याण जैसे क्षेत्रों में सहायता दी जाती है। वहीं केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान जैसे संस्थानों के जरिए कॉयर के नए इस्तेमाल पर भी काम हो रहा है। एचडीपीई प्लास्टिक कप के विकल्प के रूप में पर्यावरण-अनुकूल कॉयर रेल व्हील एक्सल पैकेजिंग कप का विकास इसका उदाहरण है। ऐसे नवाचार दिखाते हैं कि नारियल की भूसी से मिलने वाला पारंपरिक रेशा अब आधुनिक उद्योगों के लिए भी उपयोगी और टिकाऊ विकल्प बन सकता है।
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